Thursday, December 22, 2011

बलिया का दुर्गेश प्रदेश थ्रो बाल टीम में !

पीलीभीत में 17/18 दिसम्बर को आयोजित राज्य थ्रो बाल चैम्पियनशिप में बलिया के खिलाड़ियों का प्रदर्शन सराहनीय रहा जिसमें सर्वोच्च प्रदर्शन के आधार पर बलिया के दुर्गेश सिंह पुत्र शंकर सिंह निवासी राजेन्द्र नगर का चयन उप्र थ्रो बाल टीम में हुआ है। इसकी जानकारी देते हुए बलिया थ्रो बाल के सचिव धीरेंद्र कुमार शुक्ल ने बताया है कि उक्त टीम 27 दिसम्बर को पटना, बिहार में आयोजित 34 वें राष्ट्रीय थ्रो बाल चैम्पियनशिप में भाग लेगी। दुर्गेश का चयन होने पर सुरेश शुक्ला, उमेश शुक्ला, दिनेश शुक्ला, धनंजय सिंह, सुमित मिश्र, धीरज ठाकुर, परशुराम सिंह, रमेश सराफ, सुनील सराफ, ई.अरुण सिंह आदि ने प्रसन्नता व्यक्त की है।

Monday, December 19, 2011

कर्म की महत्ता बताने पृथ्वी पर आते हैं भगवान !



मानव जाति को सत् मार्ग से विमुख करने वाले असुर प्रवृतियों को तो भगवान बैकुण्ठ में बैठे-बैठे ही समाप्त कर सकते हैं पर बार-बार धरती पर आकर वे धर्म की महत्ता को सिद्ध करते हैं। उक्त बातें श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन सोमवार को रामानुजाचार्य जगतगुरु स्वामी श्रीधराचार्य जी महराज ने प्रवचन के दौरान कहीं। रामलीला मैदान के प्रांगण में श्री बलिया सत्संग सेवा समिति के बैनर तले आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में उमड़े भक्तों के सैलाब के समक्ष संत श्री ने कहा कि जब-जब धर्म की क्षति व मानव को अपने कर्म की राह में विमुख करने वाली शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ भगवान को धरती पर आना पड़ा। भगवान का रामावतार कर्मयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। कथा में संतश्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्म और बालपन की लीलाओं का वर्णन कर भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूतना वध के प्रसंग को भी बड़े मनोहर ढंग से प्रस्तुत किया। कृष्ण के अवतार को बताते हुए कहा कि कंस ने जब मानवता को खत्म करने का प्रयास किया तो भगवान को अवतार लेना पड़ा। कंस के सहभागियों को बारी-बारी मारकर भगवान ने यह बताने का भी प्रयास किया कि बुराई एक बार में ही समाप्त नहीं होती उसे व्यवस्था से भगाना पड़ता है। कथा के यजमान डीपी ज्वेलर्स रहे।

दो कुल संवारती हैं बेटियां

भागवत कथा के दौरान संत श्री ने समाज की एक प्रमुख बुराई भ्रूण हत्या पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि आज के लोग कोख में बेटियों को मारने से परहेज नहीं कर रहे पर वे भूल जाते हैं कि बेटा कितना भी लायक हो तो एक कुल का ही मान बढ़ाता है किन्तु काबिल बेटी दो कुलों को सुशोभित करती है।

निकाली कृष्ण जन्म की झांकी

श्रीमद् भगवत कथा के चौथे दिन शाम को संत श्रीधराचार्य के साथ आयी टीम ने भगवान श्री कृष्णा के जन्म की मनोहर झांकी प्रस्तुत की।

Sunday, December 18, 2011

कभी भक्त वत्सल को सच्चे दिल से बुलाओ तो !!!!!

भक्त और भगवान के बीच का संबंध किस तरह का होता है यह समझने ओर समझाने के लिए पर्याप्त है कि द्रौपदी और कृष्ण के प्रसंग देखें। किस तरह हस्तिनापुर की राजसभा में अपनी लाज बचाने के लिए चिल्ला रही उस अबला की चीख सुन कर भगवान प्रकट हुए। ग्राह द्वारा घिरे होने पर गजराज की पुकार पर भगवान का नंगे पांव आना भी यह बताता है कि यदि तुम सच्चे मन से भगवान को पुकारो तो वह हर कार्य छोड़कर भागता हुआ आता है। इसलिए अगर आप सच्चे मन से अपने को भगवत भक्ति में समर्पित कर दें तो आपका कल्याण हो जाएगा। उक्त बातें श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन रामानुजाचार्य जगदगुरु श्रीधराचार्य जी महाराज ने कही। श्री बलिया सत्संग सेवा समिति के बैनर तले आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में संतश्री ने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करने की सलाह भी दी। कहा कि सांसारिक सुख छोड़कर यदि तुम अपना जुड़ाव भगवान से करो तो वह ठीक उसी तरह तुमसे जुड़ जाएगा जैसे शादी के बाद ससुराल गयी स्त्री एक साथ दर्जनों रिश्तों से तुंरत ही जुड़ जाती है। संतश्री ने यह भी कहा कि मानव आज भौतिकता में इस कदर लिप्त है कि वह धन की चोरी पर तो अफसोस और चिंतन करता है पर मन और इंद्रियों के नियंत्रण विहीन होने पर होने वाले जीव के नुकसान के प्रति सोचता ही नहीं। कहा कि दुर्भाग्य है कि आज का इंसान सत्य बोलना, दया करना, पवित्रता से रहना, सहनशीलता, मन और इंद्रियों को वश में रखना व जरूरतमंदों की मदद करने जैसा मूल मंत्र ही भूलते जा रहा है। कथा में भक्तों की भारी तादाद उमड़ी रही। चौथे दिन की कथा के यजमान विजय गुप्त व अभिषेक गर्ग रहे।

Thursday, December 1, 2011

रामचरित मानस कहने व सुनने मात्र से सुधर जाता इहलोक- परलोक !

श्री रामचरितमानस पाठ के कहने सुनने मात्र से लोगों का इहलोक व परलोक दोनों सुधर जाता है। यही एक मात्र ग्रंथ है जिनके कहने से उस स्थल पर कथा श्रवण करने कोई आये या न आये किन्तु श्री हनुमत लाल जी अवश्य आते हैं। स्थानीय श्री नाथ मठ पर आयोजित श्री राम कथा सत्संग व मानस प्रवचन के पांचवें दिन बुधवार को जालौन से पधारे श्री माधवादासचार्य जी ने श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए उक्त उद्गार व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि पुत्र को जहां आज्ञाकारी होना चाहिए वहीं पत्‍‌नी को अपने पति की मर्यादा की रक्षा में सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहिए। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण श्रीराम व सीता को देते हुए उन्होंने कहा कि अगर श्रीराम आज्ञाकारी पुत्र न होते तो आज उन्हें कौन जानता। श्री राम के वन गमन में ही उनकी प्रसिद्धी छिपी थी और मां जानकी सहित उर्मिला आदि पति के दु:खों में साथी बन कर ही पूजी जाती हैं। झांसी से पधारीं प्रज्ञा भारती ने हनुमान की वीरता और भक्ति भरे प्रसंगों की चर्चा करते हुए श्रीराम का प्रिय भक्त बताया तथा निवेदन किया कि भक्तों को हनुमान जी के जीवनी से प्रेरणा लेकर अहंकार रहित भक्त बनना चाहिए। भजना नंदी श्याम देव चौबे ने भी भजनों के माध्यम से शिव महादेव की चर्चा कर भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम के यज्ञाचार्य पं.राकेश चौबे रहे।

Thursday, November 24, 2011

राष्ट्रीय विकलांग तैराकी में जलवा दिखाएगा बलिया का लक्ष्मी साहनी !

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में नौ दिसम्बर से प्रारम्भ हो रही राष्ट्रीय विकलांग तैराकी चैम्पियनशिप में दोनों पैरों से विकलांग इस जनपद का लक्ष्मी साहनी भी जलवा दिखाएगा। हालपुर निवासी लक्ष्मी ने बीस नवम्बर को इलाहाबाद में सम्पन्न हुई क्वालीफाइंग प्रतियोगिता के सातवें चरण में बैक स्ट्रोक, बटर फ्लाई व फ्री स्टाइल की 100 मीटर स्पर्धा में बेहतरीन प्रदर्शन किया। नेशनल चैम्पियनशिप में वह उत्तर प्रदेश की टीम का प्रतिनिधित्व करेगा। गुरुवार को यहां वीर लोरिक स्टेडियम में आयोजित एक सादे समारोह में उसे सम्मानित किया गया। क्रीड़ाधिकारी राजेश कुमार सोनकर, स्टेडियम के एथलेटिक्स कोच देवी प्रसाद, मो.जावेद अख्तर आदि ने इस दौरान उसकी हौसला आफजाई की। बातचीत के दौरान लक्ष्मी ने बताया कि उसकी तमन्ना ब्रिटिश चैनल पार करने की है और मौका मिला तो वह यह कारनामा भी आसानी से कर दिखाएगा। बता दें कि लक्ष्मी गंगा व घाघरा को तैर कर पार कर जाता है। दो साल पहले उसने इलाहाबाद में यमुना नदी को पार कर सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। उसकी इच्छा गिनीज व‌र्ल्ड बुक में अपना नाम दर्ज कराने की है।

Monday, November 21, 2011

ज्ञानदीप से आलोकित हो रहा तकनीकी शिक्षा जगत !

अपनों से दूर परदेस में रहते हुए भी जो अपने लोगों, गाव की मिट्टी क्षेत्र तथा जनपद को न भूल सके, स्वयं के साथ-साथ उनके उन्नयन का संकल्प मन में लिए प्रयासरत हो ऐसे व्यक्ति बिरले ही होते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों में शुमार हैं डा.जय प्रकाश। 30 वर्षीय डॉ. जय प्रकाश सन्दवापुर गांव के छोटे किसान बाबू राजू राम के परिवार में पैदा हुए थे। पिता ने पश्चिम बंगाल के वर्दवान में रख अपनी देख-रेख में प्राथमिक से इण्टर तक की शिक्षा उन्हे दिलाया। वह आगे की पढ़ाई के लिए बेंगलूरु, कर्नाटक चले गये, जहां बेंगलूरु यूनिवर्सिटी से बायो टेक्नालॉजी में मास्टर डिग्री प्राप्त की। बाद में प्रेस कोट यूनिवर्सिटी से डाक्टरेट हासिल की। डॉ.जयप्रकाश उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपनी ज्ञान ज्योति से अन्य दीपों को प्रज्ज्वलित करने की ठान ली और सबसे पहले दो वर्ष के अन्तराल में ही बेंगलूरु में दो मैनेजमेन्ट इंस्टीट्यूट स्थापित कर अपने काम को आगे बढ़ाया। बाद में एक नोएडा यूपी तथा एक कोलकाता पं बंगाल में भी मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूट के साथ ही साफ्टवेयर व हार्डवेयर के लिए कास्मोसिक टेक्नालॉजी स्थापित की। उन्होंने अपने शिक्षण संस्थानों में बलिया के छात्रों को विशेष छूट दे रखी है। दर्जनों गरीब बच्चे, जो गरीबी के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने में असमर्थ हैं, उनकी शिक्षा का पूरा खर्च उठाते हैं। बलिया के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए दूर न जाना पड़े इसके लिए वे यहां उच्च तकनीकी शिक्षा संस्थान की स्थापना को भी प्रयासरत हैं।

ददरी मेले के भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस हलकान !

ऐतिहासिक ददरी मेले के मीना बाजार में छुट्टी के दिन रविवार को लोगों की काफी भीड़ रही। लोगों ने सामानों की जमकर खरीदारी की। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस पूरे दिन कसरत करती रही। ग्रामीण क्षेत्र के लोग सुबह 9 बजे ही मेले में पहुंच गये। दोपहर बाद तो मेले में काफी भीड़ हो गयी। लोग एक दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते रहे। झूला, जादू, डांस आइटमों पर युवा वर्ग की जमात अपने नंबर का इंतजार करती रही। मेले में पहली बार इतनी भीड़ देखी गयी। लोगों ने सामान की खरीदारी तो की ही, विभिन्न आइटमों का भी आनंद लेते रहे। महिलाओं ने घरेलू व अपने श्रृंगार के सामान की खरीदारी की। गरम कपड़ों की दुकानों पर भी अच्छी खासी भीड़ लगी रही। मेले में दोपहर बाद शहर व आसपास के लोग भी वाहनों से अपने परिवार के साथ निकल पड़े। मेले में उमड़ी भीड़ को देख दुकानदारों के भी चेहरे चहक गये थे। नगर पालिका ने मेले में दुकानों की संख्या बढ़ा दी है। मेले के दोनों मार्गो के बीच मे भी ठेला समेत फुटपाथ की दुकानें लगी हैं। मेला प्रभारी विमलेंदु अपने सहयोगियों के साथ कभी पैदल तो कभी घोड़े पर सवार होकर भीड़ को नियंत्रित करते रहे। वहीं चर्खी व अन्य आइटमों के पास पुलिस के जवान काफी सतर्क दिखे।

बिछड़ों को मिलाती रही पुलिस

मेले में बिछड़ों को उनके परिजनों से पुलिस मिलाती रही। इसके लिए तीन जवान पूरी तरह से डटे रहे। मेले के अंदर सबसे अधिक बच्चे परिवारवालों से बिछड़े। पुलिस ने करीब एक दर्जन बिछड़ों को उनके परिवार वालों से मिलाया। दुबहर थाना क्षेत्र के बैजनाथ छपरा निवासी बृजेश यादव की पुत्री कुसुम यादव (5) अपनी मां से बिछड़ गयी थी। इसको लेकर जवान काफी परेशान रहे। मेले में माइक से इसकी सूचना प्रसारित की गयी। काफी प्रयास के बाद उस लड़की की एक परिचित महिला मिली। देर शाम को उसके परिवार वाले पहुंच गये।

फ्री आइटम व सेल सामानों की लूट

मेले में एक से एक आइटम आये हुए हैं। इसमें बाम्बे की साड़ी की दुकान पर दस खरीदने पर एक फ्री, एक की कीमत 75 रुपये पर लूट सी मची रही। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने इसकी खूब खरीदारी की। कुछ इसी तरह की छूट कंघी, बैग, कप, गिलास समेत आदि सामान पर भी रही। वहीं हरेक माल दस रुपये व 25 रुपये की दुकानों पर भी भीड़ रही। इसके अलावा सेल के सामान की दुकानों पर भी लूट मची रही।

झूले पर खड़े होनेवालों की अब खैर नहीं

मेले में लगे चर्खी पर खड़े होकर झूलने वालों की अब खैर नहीं। तीन दिन पूर्व झूले से युवक व युवती के गिरने की घटना को देखते हुए पुलिस ने यह सख्त कदम उठाया है। मेला प्रभारी विमलेंदु ने बताया कि इसके लिए झूले वालों को भी निर्देश दिया गया है।

लकड़ी के सामानं की हुई खूब बिक्री

ददरी मेला के मीना बाजार में लकड़ी के बने सामानों की जमकर बिक्री हो रही है। इसके अलावा लोग बड़े-बड़े बक्सों की खरीदारी में भी दिलचस्पी ले रहे हैं। मेले में लोगों ने जमकर खरीदारी की। साथ ही फूल-पौधे भी ले गये। इन दिनों मेला पूरे शबाब पर है। मेले में कानपुर व सहारनपुर समेत अन्य जनपदों के व्यापारी लकड़ी की दुकानें लगाये हुए हैं। पलंग, चौकी, मेज, सोफा सहित अन्य सामान की खरीदारी कुछ ज्यादा ही हो रही है। मेले में आलमारी, छोटे-बड़े बक्से की दुकानें भी लगी हैं। गांव से आये लोगों ने इन सामानों की खरीदारी में ज्यादा रुचि दिखायी।

Sunday, November 13, 2011

अपने अंदर की कमी देखें दूर हो जायेगी अशांति !

घर के संघर्ष को मिटाओ। घर में झूठ, कपट से प्रेम की कमी होती है और विकार पैदा होता है। निन्दा से संघर्ष और ईष्र्या से अशांति पैदा होती है। हमारा जो समय प्रभु नारायण के ध्यान में जाना चाहिए वह निन्दा, ईष्र्या झूठ-कपट में बरबाद हो जाता है। सबसे बड़ी गलती हमसे होती है कि हम दूसरों के दोष को देखते हैं। दूसरों पर नजर डालना ही बुरा है अगर डालें तो उनके गुण पर ही डालें। अपने को संवार लें। अपने तन-मन को बढि़या बना लें, यह बहुत बड़ी सेवा है। स्थानीय क्षेत्र के प्रसिद्ध मंदिर श्री अमर नाथ शिव मंदिर के प्रांगण में चल रहे नौ दिवसीय श्रीराम कथा ज्ञान यज्ञ के अन्तिम दिन जुटे भक्तों के रेले को सम्बोधित करते हुए राजन जी महराज ने उक्त बातें कहीं। बताया कि फल कितना ही कड़वा क्यों न हो जब भगवान को भोग लगा दिया जाता है तब वह फल मधुर हो जाता है। श्रीराम कथा में जब इन्द्रजीत हनुमान को लेकर रावण के दरबार में जाता है। रावण-हनुमान के संवाद के दौरान रावण क्रोधित हो जाता है और श्रीराम के दूत हनुमान को मारने की बात कहता है। इतने में विभीषण आगे कर कहते हैं दूत को मारना नहीं है तो रावण कहता है कि वानरों को सबसे प्रिय पूंछ ही होती है इसकी पूंछ में आग लगा दो। पूंछ में आग लगते ही हनुमान विराट रूप धारणकर पूरी लंका को जला देते हैं। लंका विजय के बाद श्रीराम का राज तिलक होता है। चारों तरफ खुशियां मनाई जाती हैं। इसी बीच पूरे पण्डाल में फूलों की वर्षा भक्तों द्वारा की गयी। वहीं कथा पाठक राजन जी महराज के ऊपर भी फूलों व रुपयों की वर्षा कर भक्तों ने अपनी खुशी का इजहार किया। इस अवसर पर अवध किशोर सिंह द्वारा महाराज जी को एक शाल व फूल देकर सम्मानित किया गया। पूजा कमेटी के सदस्यों द्वारा पूर्व छात्र नेता गोपाल जी सिंह, तारकेश्वर मिश्र, भोला सिंह सहित दर्जनों लोगों को श्री राम-जानकी, लक्ष्मण,हनुमान की फोटो देकर सम्मानित किया गया।

Wednesday, November 9, 2011

दस वर्ष पुराना है बलिया में गंगा महाआरती का इतिहास !

कार्तिक पूर्णिमा स्नान की पूर्व संध्या पर गंगा महाआरती की परम्परा महर्षि भृगु की धरती पर काशी व हरिद्वार की तर्ज पर लगभग दस वर्षो से चल रही है। वाराणसी के विद्वान पंडित व आचार्यो के सानिध्य में इस महा आरती की शुरूआत सन् 2002 में की गयी। इस नये कार्यक्रम के साथ ही नये सिरे से संत समागम भी फिर शुरू हुआ। इस महाआरती में भृगु क्षेत्र के संत बाबा बालक दास समेत अनेक विद्वानों ने भाग लिया था। धीरे-धीरे इसका विशाल स्वरूप दिया गया। उसी समय बाबा बालक दास ने नगर पालिका परिषद के तत्कालीनअध्यक्ष लक्ष्मण गुप्त को प्रेरित कर ददरी मेले के भारतेंदु मंच पर सत्संग शुरू कराने का सुझाव दिया। तब से यहां सत्संग नगर बसाये जाने लगा। इसमें साधु संतों का जमावड़ा होने लगा। वहीं मेले में आये लोग साधु संतों का दर्शन भी करते हैं। उसी समय से गंगा महाआरती की परम्परा शुरू हुई जो आज भी कार्तिक पूर्णिमा के एक दिन पूर्व होती है। अब इसमें वाराणसी हरिद्वार समेत अन्य स्थानों के विद्वान भाग लेने लगे हैं।

Monday, November 7, 2011

कॅरियर ऑन क्लिक !

आज जो समय के साथ कदम ताल कर सकता है, वही कामयाब है। जो इससे जरा सा भी पिछडा, उसको फर्श पर पहुंचते देर नहीं लगती। जिस टेक्नोलॉजी के बूते भारत ने कभी तरक्की का ककहरा सीखने की शुरुआत की थी, आज वही टेक्नोलॉजी देश की कामयाबी के महाग्रंथ रच रही है। केवल देश की तरक्की ही क्यों, रोजमर्रा की जिंदगी में भी इसने अपना मुकम्मल असर छोडा है। ऑफिस, घर, डिपार्टमेंटल स्टोर, स्कूल कॉलेज सभी जगह आईटी आज की जरूरत बन चुकी है। उन्नत आईटी सेवा की बदौलत आज विश्व की प्रमुख परीक्षाओं के साथ-साथ भारत में भी सभी प्रमुख परीक्षाएं ऑनलाइन हो रही हैं। जीमैट, जीआरई, टॉफेल के अलावा कैट, इंजीनियरिंग, लॉ, सीटीईटी सभी परीक्षाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं या होने की तैयारी में है। विशेषज्ञों के अनुसार आनेवाले समय में यही एकमात्र परीक्षा का तरीका होगा। यही कारण है कि सभी संस्थान इस नई परीक्षा प्रणाली को लागू कर रहे हैं।

नई जेनरेशन, नई परीक्षा

भारत में ऑनलाइन का प्रचलन तेजी से बढ रहा है। चाहे आपको टिकट की बुकिंग करानी हो, बैंक से पैसे का ट्रांजैक्शन करना हो या फिर चैटिंग करनी हो-ये सभी काम आप आनॅलाइन के माध्यम से कर सकते हैं। इसकी विशेषता को देखते हुए अब ऑनलाइन एग्जाम भी देश की कई परीक्षाओं में शुरू हो गए हैं। सरल शब्दों में कहें तो ऑनलाइन एग्जाम एक नई तकनीक है, जिसमें इंटरनेट की मदद से आप परीक्षा दे सकते हैं। बस इसमें आपके पास लॉग इन आईडी व पासवर्ड की जरूरत होती है, जो सामान्यतय: एडमिनस्ट्रेटर प्रदान करता है। हां तेज नेवीगेशन के लिए आपका कंप्यूटर फै्रंडेली होना जरूरी है। इसमें इतनी आसानी रहती है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग भी इस परीक्षा को आसानी से दे सकते हैं।

कंप्यूटर पर होते हैं एग्जाम

ऑनलाइन एग्जाम के तहत स्टूडेंट्स को परीक्षा देने शहर के किसी खास सेंटर पर जाना होता है, जहां कंप्यूटर खोलने पर उसके सामने प्रश्नों का एक सेट आ जाता है। ये प्रश्न ऑब्जेक्टिव टाइप होते हैं, जिनमें चार उत्तरों में से किसी एक को चुनना होता है। कई बार प्रश्नपत्र के एक से अधिक खंड होते हैं। इनमें से आप अपनी पसंद के अनुसार खंड चुन सकते हैं। सभी प्रश्नों को हल करने के लिए निर्धारित समय-सीमा होती है। यह सीमा खत्म होते ही पेपर अपने आप क्लोज हो जाता है। ऑनलाइन एग्जाम के लिए सेंटर पर इंस्ट्रक्टर उपस्थित होते हैं, जो कोई परेशानी होने पर उसे दूर करते हैं, लेकिन इस तरह का एग्जाम देने के लिए स्टूडेंट्स यदि कंप्यूटर पर पहले से प्रैक्टिस कर लें तो बेहतर होगा।

बेहतर टेक्नोलॉजी, बेहतर रिजल्ट

परीक्षार्थियों की लगातार बढती संख्या के कारण रिटेन एग्जाम लेना कठिन होता जा रहा है। उस पर लगने वाला समय, बढते वित्तीय बोझ के कारण शिक्षा संस्थान व रिक्रू टर दोनों ही पिछले कुछ समय से नए विकल्प की तलाश कर रहे थे। ऑनलाइन एग्जाम इस मामले में उन्हें सटीक ऑप्शन देता है, जहां आप इंटरनेट पर देश-दुनिया के किसी भी संस्थान के लिए इंट्रेस एग्जाम दे सकते हैं, नौकरी के लिए इंटरव्यू दे सकते हैं, सेमेस्टर एग्जाम दे सकते हैं आदि। दूसरी ओर इसका फायदा उन संस्थानों को भी मिल रहा है, जो कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। इसके अलावा समय की बचत, किफायती व सुविधाजनक होने के नाते इन दिनों इसकी लोकप्रियता काफी बढ चुकी है।

जरूरत जैसी, एग्जाम वैसा

ऑनलाइन एग्जाम कई मायनों में फायदों का सबब बन रहा है। देखा जाए तो इसमें संस्थान व स्टूडेंट दोनों को ही काफी सुविधा होती है, क्योंकि इसमें न संस्थान को मुद्रित प्रश्नपत्रों, उत्तर पुस्तिकाओं व बडी संख्या में परीक्षकों की जरूरत होती है और न छात्रों को पेन, पेंसिल, स्केल जैसे संसाधनों की। समय की बचत होती है वो अलग से। इसके साथ इसमें एक अन्य फायदा शीघ्र रिजल्ट प्राप्त होना होता है, जहां पेपर देने के ठीक बाद आप अपना स्कोर जान सकते हैं। इसके अलावा लिखित परीक्षा में जहां एक ही तिथि में देश के विभिन्न केंद्रों पर स्टूडेंट्स के बैठने की व्यवस्था करनी होती है, वहीं ऑनलाइन टेस्ट में प्राय: स्टूडेंट्स के लिए एक ही दिन परीक्षा देने की बाध्यता नहीं होती, क्योंकि प्रश्नपत्रों के बहुत सारे सेट होने के कारण सभी स्टूडेंट्स को एक ही दिन ऑनलाइन टेस्ट नहीं देना होता। इस तरह एक ही तिथि में परीक्षा होने के कारण बडी संख्या में स्टूडेंट्स के लिए सीटिंग अरेंजमेंट की व्यवस्था भी नहीं करनी पडती है। यही कारण है कि प्राय: सभी परीक्षाएं ऑनलाइन हो रही है।

आईटी सेक्टर ने बढाई रौनक

भारत कल तक इस क्षेत्र में दोयम दर्जे की हैसियत रखता था, इस समय हर बीतते साल के साथ वह इस सेक्टर का मंझा हुआ खिलाडी बन चुका है। आज हालात यह हैं कि दुनिया के करीब एक चौथाई कंप्यूटर सॉफ्टवेयर व बीपीओ सेवाएं भारत से ही संचालित हो रही हैं। रोजगार देने में भी पिछले कई सालों से यह सेक्टर अव्वल है। ऑनलाइन जैसी तकनीकी सेवाएं इसी आईटी की बदौलत संभव हुई हैं। आज ऑनलाइन एग्जाम से लेकर बाकी ऑनलाइन सेवाओं में हम तेजी से आगे बढ रहे हैं, उसके पीछे आईटी सेक्टर में हमारी तेज ग्रोथ ही जिम्मेदार है। ऑनलाइन एग्जाम की जिम्मेदारी प्राय: कॉम्प्रिहेंसिव टेस्टिंग ऐंड एसेसमेंट सेवा देने वाली कंपनियों को दी जाती है, जिसमें ईटीएस प्रोमैट्रिक,माइक्रोसॉफ्ट इंडिया, एनआइआइटी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

प्रमुख एग्जाम हुए ऑनलाइन

देश में आज ऑनलाइन एग्जाम की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर आयोजित होने वाले कई एग्जाम मसलन, इंजीनिय¨रग, प्रबंधन, बी-एड, लॉ आदि तेजी से ऑनलाइन किए जा रहे हैं। यहां कुछ ऐसीे ही एग्जाम व संस्थान दिए जा रहे हैं, जो ऑनलाइन हो चुके हैं-

अब सीटीईटी भी ऑनलाइन

तकनीक के प्रति युवाओं के बढते रूझान को देखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड सीबीएसई ने इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए होने वाले ऑल इंडिया इंजीनियरिंग इंट्रेंस एग्जाम एआईईईई के बाद अब सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट सीटीईटी को भी ऑनलाइन करने की तैयारी कर ली है। बोर्ड ने दोनों ही परीक्षाओं को प्रोफेशनल मानते हुए इन्हें कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट फॉर प्रोफेशनल एंट्रेस एग्जाम पीईई 2012 की श्रेणी में रखा है। पीईई के आयोजन के लिए बोर्ड ने विभिन्न एजेंसियों से आवदेन मांगे हैं, जो इनका सफल संचालन करने में सक्षम हों। गौरतलब है कि सीबीएसई ने वर्ष 2011 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर एआईईईई को पेपर टेस्ट के साथ-साथ ऑनलाइन भी आयोजित किया था। अब न सिर्फ इसे विस्तार देने की तैयारी की जा रही है, बल्कि 26 जून को पहली बार आयोजित हुए सीटीईटी को भी बोर्ड ऑनलाइन करने की कोशिश में है। कैट के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में हर साल करीब 40 हजार की बढोत्तरी हो रही है। ऑनलाइन व्यवस्था शुरू होने से इस परीक्षा में शामिल होने वाले आवेदकों को खासी सुविधा हो गई है। कैट के लिए जीआरई पैटर्न अपनाया गया है। सभी प्रोफेशनल परीक्षा भी ऑनलाइन हो रही है।

टीचर्स के लिए ई-टीचिंग ट्रेनिंग

आईटी क्षेत्र में हुए हालिया बदलावों को देखते हुए कई बडे संस्थान अध्यापकों की ऑनलाइन टीचिंग की व्यवस्था करा रहे हैं। माना यह जा रहा है इससे अध्यापन कार्य बहुआयामी हो सकेगा, जिसका सर्वाधिक लाभ स्टूडेंट्स को मिलेगा। इस कार्य के लिए उन्होंने कई कंपनियों से हाथ मिलाया है। बकौल यूनिवर्सिटी प्राय: सभी टीचर्स को कम्प्यूटर की बेसिक जानकारी तो है, लेकिन ई-टीचिंग की कामयाबी के लिए उन्हें बाकायदा प्रशिक्षण देना भी जरूरी है। ट्रेनिंग के दौरान उन्हें खास तौर पर यह बताया जाता है कि कैसे इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर स्टूडेंट्स को ज्यादा से ज्यादा फोकस करने में मदद करें। इसके कई फायदे भी नजर आ रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा फायदा यह हो रहा है कि अब स्टूडेंट्स के साथ टीचर भी टेक्नोसेवी हो गए हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बढोत्तरी हो रही है।

आसान है परीक्षा

यह ठीक है कि देश के कई संस्थान अब ऑन लाइन प्रवेश परीक्षा ले रहे हैं तो कई इम्प्लॉयर भी अपने कर्मचारियों के चयन में ऑनलाइन एग्जाम का सहारा ले रहे हैं, लेकिन इससे डरने की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब तो देश की कई महत्वपूर्ण परीक्षाएं ऑनलाइन हो गई हैं और निकट भविष्य में अन्य परीक्षाएं भी इसी पैटर्न पर आधारित होंगी। इसलिए आवश्यक है कि हर स्टूडेंट ऑनलाइन प्रणाली को अच्छी तरह समझ ले। जो स्टूडेंट्स यह समझते हैं कि उन्हें फिलहाल ऐसी कोई परीक्षा नहीं देनी है, उन्हें भी पहले से इस बारे में सचेत हो जाना चाहिए। वैसे यह परीक्षा बहुत आसान है। अगर आपने कभी कंप्यूटर इस्तेमाल नहीं किया है, तो भी आप इससे एक-दो घंटे में आसानी से परिचित हो सकते हैं। बेहतर होगा कि आप इंटरनेट से प्रैक्टिस सेट लोड कर उसका अधिक से अधिक अभ्यास करें।

करें ऑनलाइन प्रैक्टिस

इन दिनों ऑनलाइन परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन के लिए मॉडल टेस्ट पेपर उपलब्ध हैं, जहां आप एकदम ऑनलाइन एग्जाम जैसी कंडीशन्स में मॉक टेस्ट दे सकते हैं। वे लोग जो ज्यादा कंप्यूटर सेवी नहीं है, उनके लिए ये टेस्ट और भी कारगर हैं। ऐसी कई वेबसाइट्स हैं जहां आपको विभिन्न कंपटिटिव एग्जाम के साथ सीबीएसई (पीसीएम, एसएसटी), जेएनयू, डीयू इंट्रेस के कई मॉडल टेस्ट पेपर हल करने को मिलते हैं। इन साइट्स में

www.wiziq.com

www.tcyonline.com

www.jumbotests.com

आदि प्रमुख हैं।

भाषा सिखाने वाली प्रमुख ऑनलाइन वेबसाइट्स

ऑनलाइन स्पेनिश के लिए वेबसाइट

21 देशों की ऑफिशियल भाषा स्पेनिश का काफी क्रेज है। यह यूरोपीय यूनियन की ऑफिशियल भाषा होने के अलावा संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषाओं में शामिल है। अगर आप भी इस भाषा को सीखना चाहते हैं, तो भारत में इससे संबंधित कई तरह के कोर्स उपलब्ध हैं। अगर आप किसी कारणवश कॉलेज नहीं जा सकते हैं, लेकिन घर बैठे ही स्पेनिश भाषा बोलना और लिखना सीखना चाहते हैं, तो आप इंटरनेट के माध्यम से इस भाषा को आसानी से सीख सकते हैं। इस भाषा को सिखाने के लिए कई वेबसाइट्स उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ पैसे लेकर सिखाती हैं, तो कुछ पर बिना पैसे के आप सीख सकते हैं।

www.studyspanish.com

www.studyspanishonline.org

ऐसी साइट्स हैं, जो आपको ऑनलाइन स्पेनिश सीखने में मदद करती हैं।

अगर सीखनी हो ऑनलाइन अंग्रेजी

अंग्रेजी विश्व की प्राय: सभी देशों में बोली और समझी जाने वाली महत्वपूर्ण भाषा है। अगर अंग्रेजी की बेहतर समझ है, तो आप विश्व के किसी भी कोने में रह सकते हैं और लोगों को अपनी बात बता सकते हैं। भारत में अंग्रेजी का क्रेज सिर चढकर बोल रहा है। कंप्यूटर की अच्छी समझ और बेहतर अंग्रेजी के ज्ञान की बदौलत भारतीय आईटी इंजीनियर प्रमुख कंपनियों की पहली पसंद हैं। यदि आप भी ऑॅनलाइन के माध्यम से अंग्रेजी लिखना और बोलना चाहते हैं, तो आप घर बैठे वेबसाइट के माध्यम से इसका लाभ उठा सकते हैं। वैसे तो अंग्रेजी भाषा सिखाने के लिए कई ऑनलाइन वेबसाइट्स हैं, लेकिनhttp://learnenglish.britishcouncil.org/en/

www.englishlink.com

वेबसाइट्स के माध्यम से आप अंग्रेजी आसानी से बोलने के साथ लिखना भी सीख सकते हैं।

सीखें फ्रैंच ऑनलाइन

विदेश में ऑनलाइन का प्रचलन काफी वर्षो से है। वहां की प्राय: सभी परीक्षाएं ऑनलाइन होती हैं। ऑनलाइन एग्जाम के जरिए आप प्रोफेशनल कोर्सेज व संस्थानों में तो इंट्री ले ही सकते हैं, साथ ही घर बैठे तरह-तरह की विदेशी भाषाएं भी सीख सकते हैं। यदि आप फॉरेन लैंग्वेज सीखने के इच्छुक हैं तो भी ऑनलाइन लर्रि्नग आपको कई विकल्प सुझाती है।

www.clickonfrench.com

एक ऐसी साइट है, जो आपको ऑनलाइन फ्रैंच सीखने में मदद करती है। गौरतलब है कि आज फ्रैंच दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा पढी व समझी जाने वाली भाषा है। खुद भारत में 3000 से ज्यादा फ्रै च कंपनियां काम कर रही हैं। ऐसे में ऑनलाइन फ्रैंच भाषा सीख कर आप खुद के लिए इस दिशा में एक कॅरियर विकल्प जरूर बना सकते हैं। इसके अलावा आप ऑनलाइन के माध्यम से अंग्रेजी भी सीख सकते हैं। इस प्रकार आप घर बैठे ही फ्रैंच सीख सकते हैं।

ध्यान रखने वाली बातें

अगर अपना कंप्यूटर व इंटरनेट कनेक्शन है, तो उस पर संबंधित विषयों के प्रैक्टिस सेट डाउनलोड करके उन्हें हल करने का बार-बार अभ्यास करें। ऐसे कई सेट विभिन्न साइटों से मुफ्त मिल सकते हैं। ल्ल अगर आपके पास अपना कम्प्यूटर व नेट कनेक्शन नहीं है, तो आप नजदीक के किसी साइबर कैफे में जाकर वहां इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं।

वे लोग जो पहली बार ऑनलाइन पेपर दे रहे हैं, हो सकता है कि उनको यह टेस्ट देने में कठिनाई हो। ऐसे में इससे परिचित होने के लिए कंप्यूटर पर प्रैक्टिस जरूर करनी चाहिए, अन्यथा स्टूडेंट्स का प्रदर्शन 20 से 25 फीसदी तक प्रभावित हो सकता है।

पहले अपने विषयों को कंपलीट करें और उसके बाद कंप्यूटर पर अभ्यास करें, क्योंकि ऑनलाइन टेस्ट में पूछे जाने वाले प्रश्न पहले की तरह आपके कोर्स पर ही आधारित होंगे।

Wednesday, October 26, 2011

....और सितारे उतर आये जमीं पर !

अंधेरे पर उजाले की विजय का प्रतीक पर्व दीपावली की पूर्व संध्या पर खिलाड़ियों ने दीपों का त्योहार अनोखे ढंग से मनाया। मंगलवार की शाम यहां वीर लोरिक स्टेडियम में रंग-बिरंगी मोमबत्तियों का कारवां रोशन होते ही ऐसा लगा मानों फलक के सितारे पल भर के लिए जमीं पर उतर आये हों। इस विहंगम नजारे का साक्षी बने सैकड़ों खेल प्रेमी। आलम ये रहा कि स्टेडियम में तो लोग जमे ही थे, आस-पास के घरों की छतों पर पर भी लोगों ने अपनी मौजूदगी दर्ज करायी। शाम ढलने के बाद दीपोत्सव की शुरुआत क्रीड़ा अधिकारी राजेश कुमार सोनकर ने एथलेटिक्स कोर्ट पर परम्परा के अनुरूप दीप जलाकर जैसे ही की, पूरा स्टेडियम रोशनी से नहा गया। क्रिकेट ग्राउण्ड के अलावा बास्केटबाल, हैण्डबाल समेत अन्य खेलों के मैदानों पर भी मोमबत्तियां व दीये जलाये गये। कुछ ही देर में पूरा स्टेडियम गुलजार हो गया। इस दौरान प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खेल संघों से जुड़े लोग व खेल प्रेमी भी मौजूद रहे। इनका स्वागत क्रीड़ा अधिकारी राजेश कुमार सोनकर, सहायक प्रशिक्षक देवी प्रसाद व मोहम्मद जावेद अख्तर द्वारा किया गया।

Wednesday, October 19, 2011

सेनानी डॉ. योगेन्द्र का निधन !

सन् 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन के दरम्यान अंग्रेज सिपाहियों की बंदूकें छीनने, डाकघर एवं रेलवे स्टेशन जलाने में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानी डॉ.योगेन्द्र नाथ तिवारी का 86 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। डॉ.तिवारी काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। चितबड़ागांव नगर पंचायत के शास्त्री नगर वार्ड निवासी योगेन्द्र नाथ तिवारी आजीवन कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे। आप कांग्रेस पार्टी के जनपदीय सेक्रेटरी क्रय विक्रय सहकारी समिति के उपाध्यक्ष, कृषि मंडी समिति के अध्यक्ष तथा सतीश चन्द्र महाविद्यालय की प्रबंध समिति में उपाध्यक्ष रहे। सेनानी के निधन का समाचार सुनते ही लोगों का हुजूम उनके आवास पर उमड़ पड़ा और भीगी आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। जिला प्रशासन के प्रतिनिधि के रूप में तहसीलदार सदर आशुतोष दूबे ने शव पर पुष्प अर्पित किये तथा 5 हजार रुपये प्रदान किये। थानाध्यक्ष प्रभुनाथ ने अपने हमराहियों के साथ गार्ड आफ ऑनर दिया। सेनानी का शवदाह तमसा तट पर गाजे बाजे के साथ किया गया।

करुणा की प्रतिमूर्ति थे बाबा पशुपतिनाथ !

स्वामी पशुपति बाबा के स्मरण से एक भव्याकृति व करुणा स्वरूप सामने आ जाता है। जिसने एक बार भी उनका दर्शन किया अपने को धन्य समझा। बाबा ज्ञान, भक्ति व साधना की त्रिवेणी थे। उन्होंने साधना के काल में बबूल व तुलसी की पत्ती खाकर और गंगा जल से तृप्त हो गंगा और नारायणी के कगारों में गर्मी-सर्दी और बरसात को मात्र एक वस्त्र के सहारे बिताकर देहाध्यास से विमुक्ति प्राप्त कर ली थी। दियारे में बबूल पतलों तथा हिंगुओं के बीच रहते थे। बाबा का आहार बथुआ, गुमबन, झूनझून का साग तथा बबूल की पत्तियां थीं। प्रमुख गुण उनकी सर्व सुलभता थी। पैसा, रुपया छूते नहीं थे। उनको इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। जान बूझकर किसी को चमत्कार नहीं दिखाते थे, कभी-कभी ऐसी घटनाएं हो जाया करती थीं। शंकराचार्य स्वरूपानन्द सरस्वती ने उन्हे आकाश मार्ग से गमन करने वाला एकमात्र यति बताया था। स्वामी त्रिदण्डी स्वामी ने बताया था कि पशुपति नाथ की लंगोटी उनके साधना काल से ही स्वर्ग में सूख रही है। करपात्री जी महराज ने चलता-फिरता भगवान शंकर तथा साधना में अपने से बहुत आगे बताया था। बाबा भक्तों के लिए माता-पिता, भाई-बंधु सखा-मित्र सब कुछ थे। किसी दर्शनार्थी किसी भी जिज्ञासु के मन के प्रश्नों तथा शंकाओं का वे बिना बताये समाधान बता देते थे। बाबा का प्रादुर्भाव विक्रम संवत 1967 कार्तिक कृष्ण सप्तमी को बलिया जिला के शुभनथही गांव में धनराज मिश्र के पुत्र के रूप में हुआ था। वह समाज के दुर्बल भोले तथा गरीब लोगों के प्रति सहानुभूति रखते थे। बाबा ने अविलम्ब गो-हत्या बन्दी हेतु स्वामी करपात्री जी महराज के आंदोलन को सफल बनाने के लिए अहम् भूमिका निभायी। बाबा 11 जुलाई सन् 2004 को पुनाई चक पटना में ब्रह्मालीन हुए।

Friday, September 30, 2011

राजा सूरथ ने बनवाया था शांकरी मंदिर !

शारदीय नवरात्र के मौके पर इन दिनों शंकरपुर की मां भगवती के मंदिर पर श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा सूरथ ने कराया था। यहां की मां भगवती का वर्णन दुर्गा सप्तशती के कवच प्रकरण में 'कर्णमूले तू शांकरी' नाम से आया है। शंकरपुर के समीप होने से शांकरी नाम स्थान विशेष के कारण दे दिया गया है। जिला मुख्यालय से 5 किमी दूर उत्तर दिशा में शंकरपुर-मझौली व बजहा गांव के बीच बलिया-बांसडीह मुख्य मार्ग के किनारे अवस्थित मां भवानी के मंदिर पर दूरदराज से श्रद्धालु आते हैं और उनका दर्शन पूजन कर वांछित मनोकामना की प्राप्ति करते हैं। शास्त्रीय आधार पर जहां तक इस मंदिर की स्थापना का प्रश्न है वह यह कि मार्कण्डेय पुराण के आधार यह राजा सूरथ द्वारा स्थापित किया हुआ सिद्ध होता है। पूर्व काल में स्वारोचिष मन्वन्तर में सूरथ नाम के राजा थे जो चैत्र वंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था। उस समय कोला विध्वंशी नाम के क्षत्रिय उनके पुत्र थे। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ जिसमें राजा सूरथ परास्त हो गये। पराजित होने के बाद राजा अपने नगर को लौट गये। वहां भी उनके शत्रुओं ने उन पर धावा बोल दिया। इसी क्रम में उनके मंत्रियों ने उनके साम्राज्य पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। सुरथ शिकार खेलने के बहाने जंगल में निकल पड़े। वहां उन्होंने मेधा ऋषि का आश्रम देखा जहां हिंसक जीव भी शांति भाव से रह रहे थे। राजा सूरथ ऋषि के दर्शन के लिए गये और उनको आपबीती सुनाई। ऋषि ने देवी का महात्म्य बताने के साथ ही राजा को देवी की शरण में जाने को कहा। राजा सूरथ एक वैश्य के साथ जगदम्बा के दर्शन के लिए नदी के तट पर रहकर तपस्या करने लगे। तीन वर्षो के बाद चण्डिका देवी ने दर्शन देकर उनकी अभिलाषा को पूरा किया। राजा को उनका साम्राज्य वापस मिल गया। बताते हैं कि राजा ने जहां तपस्या की थी वहां एक नदी बहती थी उसका नाम कष्टहर नाला हुआ जो आज कटहर नाला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजा ने इस ताल के नजदीक पांच मंदिरों की स्थापना की। जिनमें शंकरपुर का भवानी मंदिर, ब्रह्माइन की ब्रह्माणी देवी, असेगा का शोकहरण नाथ मंदिर, अवनीनाथ का मंदिर और बालखंडी नाथ का मंदिर शामिल है।

Wednesday, September 28, 2011

नदी में बहती आयीं और डेरा जमाया उजियार में !

उजियार की मंगला भवानी..। नदी में बहती आयीं और यहीं जमा लिया डेरा। इनकी महिमा अपरम्पार है। यही कारण है कि दूर-दराज के लोग भी नवरात्र में यहां आकर दर्शन-पूजन करते हैं। मान्यता है कि लगभग पांच सौ वर्ष पहले मां मंगला भवानी की प्रतिमा गंगा की पावन धारा में बहती हुई आ रही थी। अंग्रेजों द्वारा बनाये गये कोरण्टाडीह पुलिस चौकी के ठीक सामने आने पर मां की इच्छा आगे नहीं जाने की हुई। उनकी इच्छा शक्ति से उजियार निवासी दरगाही बाबा की नजर उन पर पड़ी। लगा जैसे मां उन्हें बुला रही हों। उस वक्त भादों का महीना था और गंगा काफी उफान पर थी। मारे भय के दरगाही बाबा नदी में प्रवेश नहीं करना चाहते थे तो मां ने कहा कि आओ मुझे ले चलो पानी तुम्हारे घुटने भर से ऊपर नहीं होगा। तब उन्होंने पानी में जाकर प्रतिमा को अपनी गोद में लेकर कुछ दूरी पर बगीचे में रखा। कुछ वर्षो तक मां वहीं घनघोर जंगल में रहीं। बाद में जब अंग्रेजों की निगाह उन पर पड़ी तो प्रतिमा को उन्होंने दूसरे स्थान पर ले जाना चाहा लेकिन मां की इच्छा के खिलाफ वे लोग ऐसा नहीं कर सके और अंत में उनको छोड़ कर भागना पड़ा। आज भी मां के दरबार में सबसे पहले दरगाही बाबा के परिवार के लोग ही पूजा करते हैं और उसके बाद ही उनका पट खोला जाता है। यादव परिवार में जन्मे दरगाही बाबा का परिवार उजियार में मां की कृपा से फल फूल रहा है। दरगाही बाबा के मरने के बाद अति गरीब विभूति पांडेय (निवासी कोटवा नारायणपुर) को पूजापाठ करने का अधिकार उनके परिवार वालों ने सौंप दिया। तब से उन्हीं के परिवार के लोग मां की पूजा करते आ रहे हैं।

Wednesday, September 21, 2011

भटकती बालिका को कामू शेख ने दी शरण !

लावारिस की तरह भटक रही आठ वर्षीया बालिका को अल्पसंख्यक समुदाय के एक दम्पती ने शरण दी है। बता दें कि आठ वर्षीया बालिका रात में भटकते हुए अकेले बैरिया में सड़क पर मिली थी, जिसे कबाड़ का व्यवसाय करने वाले कामू शेख अपने घर ले गए, उनकी पत्‍‌नी ने उक्त बालिका को नहला-धुला कर अच्छे कपड़े पहनाए। उसके बाद इसकी सूचना उसने थाने को दी। थानाध्यक्ष तेज बहादुर सिंह ने अगली व्यवस्था होने तक उक्त बालिका की देखरेख का जिम्मा कामू शेख को सौैंपा है। उल्लेखनीय है कि उक्त बालिका अपना नाम अन्नू पिता का नाम चंद्रपाल सिंह और मां का नाम रेखा सिंह बता रही है। अपने स्कूल का नाम द्रोणाचार्य स्कूल बता रही है किन्तु अपने गांव या शहर का नाम नहीं बता पा रही।

Monday, September 19, 2011

नीदरलैण्ड अधिवेशन में डॉ.गोपाल तिवारी भी करेंगे शिरकत !

कहावत है कि जब तक सांस तब तक आस। फणीश्वर नाथ रेणु की एक उक्ति भी है कि पहली श्वांस से जब दूसरी श्वांस मिलती है तो जीवन होता है और पहली श्वांस से दूसरी श्वांस बिछुड़ती है तो मृत्यु होती है। कह सकते है कि सांस ही जीवन है। इसी महत्ता पर श्वांस जनित रोगों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा- परिचर्चा के लिए विश्व भर के श्वांस रोग विशेषज्ञों का पांच दिवसीय वार्षिक अधिवेशन नीदरलैण्ड की राजधानी अमस्टर्डम में 24 से 28 सितम्बर तक यूरोपीय रेस्पाइरेट्री सोसाइटी के बैनर तले होने जा रहा है। यह विश्व का सर्वोत्तम मान्यता प्राप्त अधिवेशन है। इसमे ंडॉ.गोपाल तिवारी भारत से पंजीकृत डेलीगेट के रूप में नीदरलैण्ड जा रहे हैं। इस अधिवेशन में क्षय रोग, दमा, सीओपीडी, आईएलडी और कैंसर आदि रोगों पर अत्याधुनिक आविष्कारों के परिप्रेक्ष्य में चर्चा-परिचर्चा होगी। साथ ही विशेष वर्कशाप के माध्यम से उपरोक्त रोगों की जटिलताओं से अवगत कराया जाएगा।

Sunday, September 11, 2011

दैनिक जागरण की खबरें बनीं आकर्षण का केन्द्र !

सेंट जेवियर्स स्कूल में रविवार को भी हस्तनिर्मित वार्षिक कला प्रदर्शनी की धूम रही। इस दौरान बड़ी संख्या में अभिभावकों ने कलाकृतियों का अवलोकन किया एवं जमकर सराहना की।

प्रदर्शनी के दूसरे दिन दैनिक जागरण अखबार के विभिन्न खबरों की भी प्रदर्शनी लगी जो विशेष आकर्षण का केन्द्र रही। विद्यालय के छात्रों द्वारा स्थानीय स्तर की बड़ी खबरों की कतरन के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन अभियान संबंधित जागरण की तमाम प्रस्तुतियों को सलीके से प्रदर्शित किया गया था। इसमें सर कटा सकते है लेकिन.., दबंग अन्ना: मन बलवान लागे चट्टान के अलावा हाल-ए-अन्ना आदि विशेष चर्चा में रहीं। वहीं वर्ष की सबसे बडे़ सड़क हादसे की गवाह बनी ट्रैक्टर-ट्राली दुर्घटना की प्रदर्शनी भी क्षेत्र के दर्द को बयां कर रही थी। रो पड़ा फलक फटा धरती का कलेजा, मंदिर की डगर में नाची मौत की रपट को भी भरपूर स्थान दिया गया। ऐसे अखबारी कतरनों की रपट को लोगों ने चाव से पढ़ा व एलबम के रूप में प्रदर्शित करने वाले छात्रों को पुरस्कृत किया गया।

प्रदर्शनी के दूसरे व समापन दिवस समारोह को संबोधित करते हुये प्रिंसिपल जेआर मिश्र ने बच्चों द्वारा स्वहस्तनिर्मित कलाकृतियों की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी ही छात्रों के मानसिक विकास व शिक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण है। उक्त अवसर पर प्रबंधक केके मिश्र, सिटी ब्रांच इंचार्ज शीला मिश्रा, डब्लू जी, पॉल टाइटस, डीएन तिवारी, सुरेश कुमार गुप्ता आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। प्रदर्शनी को सफल बनाने में पीयूष त्रिपाठी, नीलम वर्मा, डीबी मिश्र, संजीत कुमार आर्य, अजय कुमार उपाध्याय, किरण शुक्ला, एसएन खरे, प्रमोद कुमार, रंजीत सिंह, राजेश कुमार पाण्डेय, बाल मुकुंद पाठक, अरूण कुमार पाण्डेय, संजीत कुमार, नुजहत जहां, नाजीश, मदन यादव, शिप्रा त्रिपाठी, शिल्पी साहू, शिल्पी जान, च्योति मिश्रा आदि का सराहनीय योगदान रहा।

Monday, September 5, 2011

कुल 91 लाभार्थियों को दिए सिलाई मशीन व कम्प्यूटर कीट्स !

नगरीय क्षेत्र के बीपीएल व शिक्षित बेरोजगार युवकों को सिलाई व कम्प्यूटर से नि:शुल्क प्रशिक्षित कर रोजगार दिलाने के उद्देश्य से वर्ष 2009-10 के सिलाई व कम्प्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले क्रमश: 40 व 51 लाभार्थियों को शहर के जगदीशपुर स्थित पानी टंकी परिसर में आयोजित वितरण शिविर में 40 उषा सिलाई मशीन व 51 कम्प्यूटर किट्स का वितरण अपर जिलाधिकारी रामसजीवन व अध्यक्ष नगर पालिका परिषद बलिया संजय उपाध्याय द्वारा किया गया। एडीएम ने प्रशिक्षार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि गरीब व छोटे तबके के लोगों को रोजगार मुहैया कराने के उद्देश्य से विभिन्न ट्रेडों में आईटीआई के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाता है। डूडा के पीओ एडीएस चौहान ने कहा कि जनपद के सभी नगरीय क्षेत्र के बीपीएल श्रेणी के 18 से 35 आयु वर्ग के शिक्षित बेरोजगार युवा/युवतियां मोटर ड्राइविंग, कम्प्यूटर, मोबाइल रिपेयरिंग, सुरक्षा गार्ड आदि में नि:शुल्क प्रशिक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार की उपलब्धता को दृष्टिगत रखते हुए प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु संबंधित निकाय के अधिशासी अधिकारियों एवं जनपद स्तर पर डूडा कार्यालय से सम्पर्क पर पंजीकरण करा सकते हैं।

शिविर में नपा के ईओ बीपी सिंह, आईटीआई बलिया के प्रधानाचार्य आरपी यादव, सीडीएस अध्यक्ष श्रीमती माया देवी व कुमारी हीरा सहित अन्य कर्मचारीगण व लाभार्थी उपस्थित रहे।

Thursday, September 1, 2011

!!!!! मैं ही मैं हूं !!!!!

मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं.. मेरी मर्जी..

क्यों भई? ऐसा कैसे चलेगा? ये हक आपको किसने दे दिया कि आप चाहे जो करें, सब चलेगा? क्या आप परमपिता परमेश्वर हो गए हैं कि सब आप ही का चलेगा? दुनिया में दूसरे किसी को कोई हक नहीं रह गया है? क्या सबके जीवन के सारे अधिकार सिर्फ आपकी मुट्ठी में सिमट कर रह गए हैं?

जी हां, क्योंकि..

इस जमीं से आसमां तक

मैं ही मैं हूं..

वजह टकराव की

आम राय मानें तो यही आज की दुनिया की सोच बनती जा रही है। जाहिर है, इसमें मैं भी शामिल हूं, आप भी शामिल हैं, ये भी शामिल हैं, वो भी शामिल हैं और हमारे आसपास के सभी लोग- स्त्री-पुरुष, बच्चे-बुजुर्ग.. भी शामिल हैं। क्या पता कुछ लोग इस सोच से मुक्त ही हों, लेकिन इससे क्या होता है? करीब सात अरब की आबादी में एक-आधा अरब लोग सही सोच रखते हों और बाकी दुनिया को उससे प्रभावित न कर सकें तो फर्क ही क्या पडता है? गलत सोच के बहुमत से आजिज आकर सही सोच का अल्पमत अकसर उनके पाले में जा खडा होता है। ऐसा इतिहास में कई बार देखा जा चुका है। हम शायद फिर इसी दिशा में बढ रहे हैं।

हालांकि उस तरफ बढना कोई नई बात नहीं है। सच तो यह है कि इस सोच की मौजूदगी दुनिया के हर समाज में हमेशा रही है। एक छोटे से घर के भीतर होने वाले विवादों से लेकर कई महायुद्ध तक इसके प्रमाण हैं। लेकिन बहुत लोग ऐसा मानते हैं कि पहले इस सोच से ग्रस्त लोगों की संख्या कम थी, जो अब बहुत बढ गई है और बढती ही जा रही है। जब उनकी तादाद कम थी तो यह सोच बहुत लोगों को प्रभावित करने की हैसियत में नहीं थी, लेकिन अब जब आबादी में ऐसे लोगों का अनुपात बढता ही जा रहा है तो? अब वे बाकी आबादी को दबाने की हैसियत में आ गए हैं और दबा रहे हैं। बेशक, वे कभी एकजुट नहीं हो सकेंगे। क्योंकि अहंकार और स्वार्थो की अंधी दौड सिर्फ लडाती है, बांधती नहीं। यह सिर्फ तोडती है, जोडती नहीं। लेकिन दुनिया की ज्यादातर आबादी अगर आपस में टकराव की शिकार हो, तो जो उसमें शामिल न हों यानी शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहें, वे भी शांति से कैसे जी सकेंगे?

मैं की खोह

यह एक त्रासद सच है कि इस सोच के साथ-साथ इसका असर भी व्यापक होता जा रहा है और उसे साफ-साफ देखा भी जा रहा है। परिवारों के टूटने से लेकर सामाजिक विघटन और कई राष्ट्रों में गृहयुद्ध तक..। टूटने का यह सिलसिला अंतहीन है। आम जनजीवन में देखें तो छोटी-छोटी बातों पर लडाई, रोडरेज, संयुक्त परिवार की तो बात ही छोडिए, एकल परिवारों में दांपत्य संबंधों तक का टूटना, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, छोटी-छोटी बातों के लिए निहायत निम्न कोटि की चालाकियां.. क्या है यह सब? ऐसा लगता है, गोया किसी का किसी से कोई मतलब नहीं रह गया है। हर शख्स अपने-आपमें ही गुम है और मैं मेरे की उस खोह से बाहर आने की इच्छाशक्ति तक खो चुका है।

सोच का फर्क

लेकिन नहीं, इसे अपनी स्थायी सोच बनाने के पहले जरा ठहरिए। अपने आसपास जरा नजर दौडाइए, तमाम दुराग्रहों से मुक्त होकर। आप पाएंगे.. कहीं कोई दुर्घटना घट गई और इर्द-गिर्द मौजूद हर शख्स अपने स्तर से हर संभव मदद के लिए तैयार खडा होता है। देश ही नहीं, दुनिया के किसी कोने में कोई प्राकृतिक आपदा आ गई और जिससे जो संभव है, वह वही लेकर मदद के लिए हाजिर है। और तो और, व्यवस्था में व्याप्त खामियों के खिलाफ आवाज उठाने की बात हो, तो भी देख लें। उन्हें नेतृत्व की नीयत पर भरोसा होना चाहिए, फिर देखिए, क्या नहीं कर गुजरते हैं लोग। अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में बेतरह व्यस्त आज का युवा, जो अपने स्वास्थ्य जैसी अनमोल चीज के लिए जरूरी लाइफस्टाइल तक की परवाह नहीं करता, वही ऑफिस से छुट्टी करके जन लोकपाल के लिए अन्ना के धरने में शामिल होता है और उनके लए जनमत सर्वेक्षण तक करता है। बिना किसी पारिश्रमिक और बिना किसी लालच के। वह यह काम सिर्फ कॉमन गुड के लिए करता है। ऐसा क्यों होता है कि तारे जमीं पर, पीपली लाइव, रंग दे बसंती, 3 इडियट्स, लगे रहो मुन्नाभाई, ब्लैक फ्राइडे, अ वेडनेसडे, राजनीति या गंगाजल जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड तोड देती हैं?

सोशल नेटवर्किग साइट ट्विटर पर अभिव्यक्तियों के संदर्भ में अमेरिका की ओरल रॉबर्ट यूनिवर्सिटी के एक शोध में भी यह बात सामने आई है कि युवाओं की सबसे ज्यादा अभिव्यक्तियां सामाजिक-राजनीतिक परिघटनाओं के संज्ञान और उन पर सहमति या विरोध जताने वाली हैं। क्या मालूम होता है इससे? जाहिर है, अपने समय का समाज सबकी चिंता का विषय है। सभी इसे लेकर सोचते हैं और ईमानदारी से कुछ न कुछ करना भी चाहते हैं। यह अलग बात है कि व्यवसाय के नजरिये से अत्यंत प्रतिस्पर्धा के इस युग में उन्हें च्यादा समय अपने कामकाज को देना पडता है। इस दौरान उपजे तनाव से उबरने के लिए वे बचा हुआ समय रिलैक्सेशन पर खर्च करते हैं। अब यह अलग बात है कि रिलैक्सेशन का सबका अपना तरीका है। कोई इसके लिए ध्यान-योग की मदद लेता है, कोई पढ-लिखकर इससे मुक्त होता है और कोई मनोरंजन के विभिन्न साधनों से। पहले के लोगों की तरह वे आम तौर पर पडोसियों-परिचितों का हाल लेने या इधर-उधर के कार्यक्रमों में शामिल होने में बहुत रुचि नहीं ले पाते।

मूल्यहीनता नहीं है आधुनिकता

हम यह क्यों भूल जाते हैं कि आधुनिकता के दर्शन की शुरुआत ही व्यक्ति को महत्व देने की सोच के साथ हुई है? अब यह अलग बात है कि इस दर्शन में व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसके कर्तव्य और दायित्वों को भी पूरा महत्व दिया गया है। आधुनिकता या व्यक्तिवादी सोच का मतलब मूल्यहीनता या अपने सामाजिक कर्तव्यों-दायित्वों से मुंह मोड लेना बिलकुल नहीं है। अपने मूल रूप में व्यक्तिवादी सोच का आग्रह सिर्फ इतना ही है कि आप जैसे भी हैं, स्वयं को वैसे ही स्वीकार करें। खुद को लेकर कोई हीनता बोध या दुराग्रह न पालें। सिर्फ इसलिए कि समाज आपसे ऐसा चाहता है, कुछ भी न करें, जब तक कि आपका विवेक आपको इसकी इजाजत नहीं देता। यह याद दिलाता है कि अपनी सबसे पहली जिम्मेदारी आप स्वयं हैं। यकीनन यह सिर्फ एक दर्शन नहीं, समय की जरूरत थी। इस दर्शन ने कई मामलों में बडी राहत भी दी। उनकी सोचिए, जो किसी तरह की शारीरिक-मानसिक कमजोरी के कारण स्वयं को ही हेय मान बैठते थे। उन स्त्रियों की सोचिए जो पूरे परिवार का ध्यान रखते खुद को ही भूल जाती थीं। इसके चलते वे तमाम व्याधियों-बीमारियों की शिकार होती थीं। किसी हद तक यह बात आज भी है, लेकिन फिर भी आज की स्त्री ने स्वयं पर ध्यान देना सीखा है। समाज का भय इतना था कि कई बार लोग समाज की अपेक्षाओं पर खरे उतरने के लिए अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा खर्च कर डालते थे। इसके बाद वर्षो कर्ज चुकाते रहते थे। बहुत लोग अब इस सोच से उबर चुके हैं। जो नहीं उबरे हैं, वे उबरने की कोशिश में हैं। आज के युवा वर्ग में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो समाज के भय से कोई काम नहीं करते। वे जो करते हैं, अपने विवेक और अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं। वे यह पसंद नहीं करते कि कोई उनकी जिंदगी में दखल दे और खुद भी किसी के मामले में अनावश्यक दखल देने बिलकुल नहीं जाते।

ही नहीं भी

हां, यह तब त्रासद लगता है जब हमारी इसी प्रवृत्ति के चलते कभी-कभी बडी घटनाएं घट जाती हैं और हमें पता भी नहीं चल पाता। कई बार यह लापरवाही हमारे लिए जीवन भर के संताप में बदल जाती है। यह कुछ और नहीं, सिर्फ व्यक्तिवाद की सोच को सही संदर्भ में न समझ पाने का नतीजा है। आधी-अधूरी समझ हमेशा खतरनाक होती है। अभी जो कष्टप्रद हालात हम देख रहे हैं, वे शायद कुछ लोगों की ऐसी ही समझ के नतीजे हैं। ध्यान रहे, यह सोच यह तो कहती है कि मैं महत्वपूर्ण हूं, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं कहती कि सिर्फ मैं ही महत्वपूर्ण हूं। इसका आग्रह सिर्फ इतना ही है कि सबके यानी समाज के चक्कर में खुद को न भूलो। याद रखो कि मैं हूं यानी मैं भी इस दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूं, यह नहीं कि सिर्फ मैं ही हूं। दूसरे लोग भी हैं और उनका होना भी उतना ही अहम है, जितना कि मेरा। यकीनन, ही और भी का यह फर्क अगर हम ठीक से समझ सकें तो न परिवार टूटेंगे, न समाज और न हम खुद। बल्कि दुनिया लगातार बेहतर होती चली जाएगी।

बिना किसी औपचारिकता के भी निभा सकता हूं

अमिताभ बच्चन, अभिनेता

हम ऐसी स्थिति में हैं,जहां चार लोग हमें पहचानते हैं। हमारी बात सुनना चाहते हैं। मैं तो यूनाइटेड नेशंस के यूनिसेफ का एंबेसेडर हूं। हाल ही में मुझे नई जिम्मेदारी दी गई है। यूनिसेफ वालों ने मुझे गर्ल चाइल्ड वेलफेयर के लिए एंबेसेडर निर्धारित किया है। जब यूनिसेफ वालों की तरफ से मेरे पास यह प्रस्ताव आया, तो मैंने उनसे कहा कि हमें एंबेसेडर बनाने की क्या जरूरत है? मैं इस जिम्मेदारी को बिना किसी औपचारिकता के भी निभा सकता हूं।

जिम्मेदार हैं युवा

सोनाक्षी सिन्हा, अभिनेत्री

समाज के प्रति जिम्मेदार हैं आज के युवा। मैं ख्ाुद भी एक जिम्मेदार युवा हूं। समय के हिसाब से हम आगे बढ रहे हैं। अगर अपने लिए हम कुछ कर रहे हैं तो उसमें बुरा क्या है? लेकिन दिन भर के बाद अगर थोडा भी वक्त समाज के लिए निकाल लें तो यह अच्छी बात होगी। अपनी जेब भरने के बाद अगर दूसरे की जेब में कुछ पैसा डाल देंगे तो उससे आत्मसुख मिलेगा। आज हम अपने बारे में भी सोचते हैं और समाज के लिए भी। बस कंसेप्ट में थोडा बदलाव जरूर आया है पहले हम अपने बारे में सोचते हैं। फिर दूसरे के लिए। लेकिन सोचते जरूर हैं। वर्चुअल व‌र्ल्ड सबके लिए खुला है। अगर हम उस स्तर पर कोई बदलाव लाते हैं तो इससे अच्छा और क्या है। जहां तक मेरा सवाल है मुझे जब भी मौका मिलता है मैं समाज के लिए कुछ न कुछ जरूर करती हूं। जितना समय मिलता है मैं लोगों की मदद करती हूं। चाहे वह किसी भी तरह से क्यों न हो। अगर मुझे कोई समाजसेवी संस्था कहीं बुलाती है तो मैं चली जाती हूं। इससे चैरिटी को बढावा मिलता है। इसमें बुराई क्या है? मैं फिल्मों में काम कर रही हूं इसलिए बहुत ज्यादा कुछ तो नहीं कर सकती, लेकिन अगर किसी संस्था की तरफ से मुझे बुलाया जाता है तो मैं पूरी कोशिश करती हूं उसमें शामिल होने की। फिल्म इंडस्ट्री यूं भी इन सब मामलों में काफी आगे है।

फिल्मों के जरिये निभाता हूं

आमिर खान, अभिनेता

जहां तक सोशल रेस्पांसिबिलिटी का सवाल है, मेरे हिसाब से हर इंसान को अपने समाज के प्रति जिम्मेदार होना ही चाहिए। आप चाहे एक्टर हों या डॉक्टर हो, चाहे बिजनेसमैन हों या जर्नलिस्ट हों, ड्राइवर हों, दुकानदार हों, फिल्ममेकर हों, या फिर कथाकार..देश के हर इंसान को अपने समाज की बेहतरी के लिए योगदान करना चाहिए। जरूरी नहीं कि आप कुछ बडा करें। जितना आपके हाथ में है, उतना जरूर करिए। मैं एक एक्टर के तौर पर जितना कर सकता हूं, जरूर करता हूं। लोग कहते हैं कि आप पॉलिटिक्स में घुसने वाले हैं क्या? मैं उनसे कहता हूं कि जरूरी नहीं है कि पॉलिटिशियन बनकर ही ऐसे काम किए जा सकते हैं। मैं अपनी फिल्मों से वह काम करता हूं। अपनी फिल्मों के जरिये अपने सोशल कंसर्न लोगों तक पहुंचाता हूं।

बखूबी समझता हूं जिम्मेदारी

संजय दत्त, अभिनेता

मैं अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को बखूबी समझता हूं। हमारा परिवार हमेशा अपने सामाजिक दायित्व को निभाने में आगे रहा है। दत्त साहब द्वारा स्थापित नरगिस दत्त मेमोरियल फाउंडेशन के जरिये हम कैंसर पीडित मरीजों की मदद करते हैं। साथ ही, मैं स्वयंसेवी संस्था सपोर्ट से भी जुडा हुआ हूं, जो सडक पर अपना जीवन बसर करने वाले बच्चों को नशे से दूर रखने में मदद करती है। मैं नहीं चाहता कि जिन हालात से मैं गुजर चुका हूं उससे कोई दूसरा बच्चा गुजरे।

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संस्कारों की अहमियत समझें

शिखा स्वरूप, अभिनेत्री

मैं ऐसे संस्कारों के साथ पली-बढी हूं कि व्यक्तिवाद की सोच से भी दूर रहती हूं। हम जिस फील्ड में हैं वहां भी सेंसर बोर्ड है। उसे देखना होता है कि क्या गलत है और क्या सही। इसी तरह घर में भी मां-बाप सेंसर बोर्ड का काम करते हैं। उन्हें अपने बच्चों पर ध्यान देना होगा कि वे कुछ ऐसा न करें। यहां अहम बात यह भी है कि जब हम ही सही नहीं होंगे, तो बच्चों को क्या कहेंगे? मैं आजाद खयाल होने को बुरा नहीं मानती, लेकिन आजादी की भी सीमा होती है। हद से बाहर जाना आजादी नहीं, मनमानी है। आज बच्चे जब कॉलेज में जाते हैं या वे 17 साल के होने के बाद जब घर से बाहर दोस्तों के साथ होते हैं तो उनकी सोच क्या होती है, यह बात किसी छिपी नहीं है। हर जगह ऐसा देखने को मिलता है कि जब जो चाहें लोग कर रहे हैं, बच्चे जो मन में आया बोल रहे हैं। समाज कैसा और कैसे बुजुर्ग? मेरी समझ से यहां आपके संस्कार का उनमें होना ही काम आएगा।

मैं दिखावे से हमेशा दूर रहती हूं और लोगों से भी यही बात कहती हूं कि वे बेवजह दिखावे से खुद को दूर रखें। एकल परिवार पश्चिम की सोच है और चूंकि हमारे यहां यह अब गहरी जडें जमा रहा है, तो उसका खमियाजा भी भुगत रहे हैं बहुत लोग। मान-मर्यादा जैसी बातें तो कम ही देखने को मिलती हैं। जिसे देखो वही पैसे के पीछे दौड रहा है। पता नहीं लोगों को कितने पैसों की जरूरत है। उन्हें और कितना चाहिए यह भी सीमा नहीं है। जो मिल जाए वह भी कम है। हम समाज के साथ जीते हैं। मैं तो छोटी-छोटी बातों को लेकर हर किसी से कहती हूं कि जब हम अपने घर को और मन को साफ नहीं रख सकेंगे तो भला देश को क्या साफ कर पाएंगे?

रतन

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गायब हो गए आदर्श

नलिनी, नृत्यांगना

संबंध समाज की बहुत बडी देन हैं और ये दूसरों को महत्व देने से ही बनते हैं। जिस व्यक्ति की सोच के केंद्र में सिर्फ वही होगा, उसके लिए संबंधों का निर्वाह कर पाना कभी संभव नहीं होगा। हमारे समाज की यह सोच नहीं रही है। सामाजिक व्यवस्था की हमारी सोच दुनिया में शायद सबसे पुरानी है। इसे संगठित करके इस तरह बनाया गया है कि मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी और पेड-पौधे तक आपस में एक-दूसरे से जुडे रहें। सबके अधिकार थे तो सबकी जिम्मेदारियां भी तय थीं और सभी उन्हें निभाते भी थे। स्त्री-पुरुष अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए एक-दूसरे के योगदान का सम्मान करते थे। पति अगर आर्थिक आय के लिए घर से बाहर होता था तो पत्नी घर के भीतर की जिम्मेदारियां निभाती थी। आज दोनों कमाने में लगे हैं, लेकिन जिस सुख के लिए सारी परेशानियां मोल ले रहे हैं, वही जीवन से गायब है।

संगीत-नृत्य की दुनिया में भी यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। पहले कलाकार कला के उद्देश्य को महत्व देते थे। वे जानते थे कि कला की दुनिया में लोग तनाव से मुक्ति पाने के लिए आते हैं। वे उसी अनुसार अपनी प्रस्तुतियां करते थे। शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनियों और नृत्य विधाओं में इसका खयाल रखा जाता था। अब कई कलाकारों के लिए श्रोता-दर्शक और उसके जीवन की सुख-शांति महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। उन्हें अपने व्यक्तित्व का विस्तार सबसे जरूरी लगने लगा है। इसके लिए वे चमत्कार के पीछे पडे रहते हैं। इससे कलाकार भले बडे बन जाएं, लेकिन श्रोता या दर्शक तो सिर्फ तनाव पा रहे हैं। बच्चों या युवाओं में बडों के प्रति सम्मान का भाव नहीं दिख रहा है। नतीजा यह हुआ है कि समाज से मूल्य गायब हो रहे हैं। आदर्श जीवन के किसी क्षेत्र में दिख ही नहीं रहे हैं और यह इसका सबसे बडा दुष्परिणाम है।

व्यक्तिगत सक्रियता जरूरी

कोयना मित्रा

समाज से जुडी चिंता को दिखाने के लिए यह काफी नहीं है कि आप सोशल आर्गेनाइजेशन को कुछ पैसे डोनेट कर अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं। सलेब्रिटी चाहें तो काफी कुछ कर सकते हैं। हमारी पर्सनैलिटी और हमारा चेहरा सामाजिक समस्याओं से जूझने में मददगार हो सकता है। लोग हमारी बात सुनते हैं और उसे फॉलो करने की कोशिश करते हैं। जब भी मौका मिलता है मैं व्यक्तिगत तौर पर सामाजिक मुद्दों से जुडे कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हूं और अपनी बात रखती हूं। मेरी मौजूदगी से यदि आम लोगों का ध्यान किसी सामाजिक समस्या की तरफ जाता है तो मैं हमेशा तैयार रहती हूं।

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मुश्किल से मिलता है समय

विनय पाठक, अभिनेता

मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि लोगों का समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव गायब हो गया है। दरअसल, अब लाइफस्टाइल ऐसी हो गई है कि अपने घर-परिवार तक के लिए बमुश्किल समय मिलता है। मैं अपनी ही बात करूं तो शूटिंग के बाद जो कुछ भी समय मिल पाता है, मैं आराम करना चाहता हूं। अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहता हूं। उसके बाद समाज के लिए कुछ करने का समय कम ही मिलता है। कई बार मैंने चैरिटी शोज किए हैं। ऐसा कहीं भी पता चलता है तो मैं अपने योगदान के लिए तुरंत तैयार हो जाता हूं। आज हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर सब कुछ डाल देता है। मैं अकेले कैसे करूं की दुहाई देने लगता है। लेकिन अगर हर कोई समाज के लिए निजी स्तर पर न सोचे किसी दूसरे को जिम्मेदार ठहराए तो कुछ नहीं होने वाला। इसे पल्ला झाडना ही कहा जा सकता है। लोगों की सोच बदल चुकी है। समाज के डर से स्त्रियां जीवनभर पति और ससुराल वालों का जुल्म नहीं सह रही है। उसके खिलाफ आवाज उठा रही हैं। यह अच्छी बात है। पर अगर समाज का जरा भी डर नहीं रहेगा तो दिनदहाडे दुष्कर्म, कत्ल, चोरी, छेडखानी जैसी घटनाएं भी बढ जाएंगी। कुछ नियम और डर निहायत जरूरी होते हैं। बदलाव कोई भी हो, उसके पहलू हमेशा दो होते हैं। लोग अपने तक सीमित हो गए हैं तो यह इस लिहाज से अच्छा है कि अब वे अपने बारे में सोचने लगे हैं।

मैं ख्ाुद को एक जिम्मेदार नागरिक मानता हूं। हम चैरिटी के लिए काम करते हैं। चाहे वह कन्या भ्रूण सुरक्षा के लिए हो या साक्षरता के लिए। मैं घर-घर जाकर भी जागरूकता कार्यक्रम चला चुका हूं।

इला श्रीवास्तव

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अध्यात्म ही बचा सकता है समाज को

आशुतोष जी महाराज

आज स्वार्थ के बढते दायरों के समक्ष समाज गौण हो गया है। दूसरे शब्दों में यह अधिकारों एवं कर्तव्यों के बीच की लडाई है। व्यक्तिवादी सोच ने अधिकारों की मांग को प्रबलता दी है और कर्तव्यों का निर्वाह क्षीण हो गया है। इस समस्या का निदान भारतीय संस्कृति के मूल चिंतन अध्यात्म में निहित है क्योंकि यह अधिकार एवं कर्तव्य के बीच संतुलन का मार्ग है। समाज की दशा व्यक्तियों की सोच की दिशा पर निर्भर है और सामाजिक कुरीतियां सोच में स्वार्थ की अति से उत्पन्न रुग्णता का ही नतीजा हैं। इन्हें मिटाने के लिए विवेक बुद्धि की आवश्यकता है। जो देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप शुभ चयन की प्रक्त्रिया है। यह लोग क्या कहेंगे नजरिये को क्या सही है वही करेंगे में रूपांतरित करने का बल देती है।

स्वार्थजनित सोच से संयुक्त परिवार नष्ट हो रहे हैं और इससे असुरक्षा बढ रही है। संबंधों में आत्मीयता के लिए आवश्यक है प्रत्येक व्यक्ति में अध्यात्म के बीज बोने की। व्यक्तिवादी सोच विश्लेषण की प्रक्रिया है तो अध्यात्मवादी सोच संश्लेषण की। विश्लेषण में खंड-खंड टूटना है, तो संश्लेषण में खण्ड-खण्ड का एकीकरण है। स्वार्थ और अहंकार व्यक्ति से राष्ट्र तक सबको लील रहे हैं। परिणाम स्वरूप सामने है- भ्रष्टाचार, हिंसा, आंतकवाद, गरीबी, दूषित पर्यावरण और अपने अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाए युद्ध की विभीषिका में जलता विश्व। इस अग्नि का शमन केवल ब्रह्मज्ञान की शीतल फुहारों से ही संभव है। अध्यात्म से उत्पन्न सर्वे भवंतु सुखिन: की पवित्र भावना ही सबकी उन्नति में अपनी उन्नति देखने की दृष्टि दे सकती है।

बैलेंस बनाकर चलें

टॉम आल्टर, चरित्र अभिनेता

आजादखयाली अच्छी है, पर बुरी भी। जब हम बदलाव की स्थिति से गुजरते हैं, तो यह भी ध्यान रखना होता है कि हमें कितना बदलना है। लेकिन इसका होश न हमें है और न ही हमारी नई पीढी को। हमें ध्यान रखना होगा कि हम कितने साफ हैं। यदि हम साफ हैं तो दुनिया अपने आप साफ हो जाएगी और समाज भी स्वस्थ हो जाएगा। इसके मूल में अहम बात यह भी है कि संस्कार हम उन्हें कैसा दे रहे हैं और हम खुद कितने संस्कारी हैं। आजाद खयाल होना जितनी अच्छी बात है उतनी ही गलत भी। हमें बैलेंस बनाकर चलना चाहिए।

फिजूल के दिखावे और खर्च करने की बात जहां तक है, तो इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है। इस बारे में कम शब्दों में बोलना सही नहीं होगा। वैसे इससे बचना चाहिए। मैं आजाद खयाली को लेकर ज्यादा मायूस नहीं हूं, लेकिन इतना भी न हो कि हम हदें पार कर जाएं और कुछ गलत हो जाए। मैं यह कई संदर्भो को भी देख रहा हूं। हमारे यहां करप्शन भी है और पूजा भी हम ही करते हैं। यहां सब कुछ है, लेकिन बदलाव उतना ही अच्छा जितना दाल में नमक। मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम कभी एक होते हैं और कभी अलग भी।

मैं तो हर उस काम से आहत होता हूं, जो मुझे गलत लगता है। खुशी भी होती है कभी। ये सभी काम हम सभी करते हैं। रही बात समाज के प्रति जिम्मेदारी की तो मेरा सीधा मानना है कि हम सभी समाज में ही जीते हैं, जहां जाते हैं वहां क्षण में एक समाज बन जाता है। हम समाज के बिना कैसे जी सकते हैं?

समाज व देश के बारे में सोचना जरूरी

माधुरी दीक्षित

सामाजिक जिम्मेदारी को महसूस करना वक्त की मांग है। हमें खुद से ऊपर समाज और देश के बारे में सोचने की जरूरत है। जरूरी नहीं है कि हम कुछ बडा करें। छोटी-छोटी बातों से आप समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सकते हैं। मैं ऐसा करती हूं। अपने आस-पास के लोगों की खुशियों का खयाल रखें। अगर आपके आसपास कुछ बुरा हो रहा है तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी खुद पर लें। सामाजिक रूप से जागरूक होने का मतलब है कि आप अपना नेता ख्ाुद चुनें, वोट करें। जहां रहें, उस जगह को साफ और अपराधमुक्त रखने में मदद करें। पर्यावरण पर ध्यान दें। इलेक्ट्रीसिटी सेव करें। हमेशा सही का साथ दें। मैं यूएस में रहूं या इंडिया में.. अपनी जिम्मेदारियों को नहीं भूलती हूं। अपनी क्षमता के अनुसार बेहतर समाज और देश के निर्माण में अपना योगदान करती हूं।

टाइम पास के लिए सही नहीं

राहुल बोस

मेरी व्यक्तिगत राय है कि एक सलेब्रिटीज को अपने सोशल कंसर्न से जुडे होना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके मोहल्ले, शहर और देश में क्या हो रहा है? और क्यों हो रहा है? उन्हें अपने मौलिक अधिकार और क‌र्त्तव्य की जानकारी होनी चाहिए। हालांकि वे सोशल एक्टिविटी में हिस्सा लेते हैं या नहीं, यह पूरी तह उनकी सोच पर निर्भर करता है। ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लेते समय उन्हें एंजॉय करना चाहिए। अगर वे टाइम पास के लिए सोशल एक्टिविटी का हिस्सा बनते हैं तो यह कहीं से भी सही नहीं है। ऐसे लोगों के लिए बेहतर है कि वे सामाजिक जिम्मेदारी का नाम करने के बजाय ग्लैमर की दुनिया में ही व्यस्त रहें।

Sunday, August 28, 2011

कर्मो से ही होती है व्यक्ति की पहचान !

किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से होती है। भारतीय संस्कृति में भी कर्म की ही प्रधानता रही है। आवश्यकता इस पर विशेष जोर देने की है। यह बातें भाजपा के राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य पूर्व एमएलसी प्रो.रामजी सिंह ने कहीं। वह समाजसेवी स्व. हर्षनारायण प्रसाद की 8 वीं पुण्यतिथि पर शनिवार को यहां आर्य समाज मंदिर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति में जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी ऊंचा स्थान दिया गया है और इन्हीं भावनाओं से ओतप्रोत होकर ही हमें अपने समाज व राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए और स्व. हर्षनारायण प्रसाद उन्हीं गुणों से सम्पन्न एक महान विभूति थे। वह अपने आचरण व विचारों से न केवल अपने छात्रों को अपितु पत्रकारिता व समाज को भी हमेशा नयी दिशा देते रहे। सभा को नगर पालिका अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सोनी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष शिवभूषण तिवारी, अंजनी कुमार पाण्डेय, दीनानाथ सिंह, बलवन्त सिंह, हर्षनारायण सिंह, शिशिर श्रीवास्तव, दिनेश वर्मा, केपी सिंह आदि ने संबोधित किया। इस अवसर पर विशिष्ट सेवाओं के लिए सच्चिदानन्द तिवारी, इश्तियाक अहमद, भुवाल जी प्रसाद, बालचन्द्र जी, केपी सिंह, डा. डीडी दूबे, डा. रामानुज मिश्र, डा. जयप्रकाश वर्मा, बलवन्त सिंह, अंजनी कुमार पाण्डेय, दीनानाथ सिंह, चन्द्रहास सिंह, हर्षनारायण सिंह तथा हीरा प्रसाद आदि को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के आयोजक डा. विवेकानन्द ने मुख्य अतिथि को अंग वस्त्रम एवं रामचरित मानस की पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया। अध्यक्षता प्रो. आत्मा सिंह तथा संचालन वरिष्ठ भाजपा नेता वाल्मीकि त्रिपाठी ने किया।

Monday, August 22, 2011

रो पड़ा फलक, फटा धरती का कलेजा !

किसी ने सोचा भी नहीं था कि सोमवार की सुबह, मौत का खेल खेलेगी लेकिन हुआ यही और ट्रैक्टर ट्राली हादसे के रूप में बागी धरती को तीसरी बड़ी त्रासदी झेलनी पड़ी। खास बात यह रही कि रूह को कंपा देने वाली अब तक की तीनों ही घटनाएं सोमवार के दिन ही हुई। नगरा थानांतर्गत निछुआडीह, गौवापार गांव के समीप सोमवार पूर्वाह्न करीब दस बजे पानी से भरे गढ्डें में ट्रैक्टर ट्राली के पलट जाने से उस पर सवार लोगों में से 41 की मौके पर हुई मौत ने एक बार फिर जनपदवासियों को झकझोर कर रख दिया और आंखों में कौंध गया 17 अक्टूबर 2005 व 14 जून 2010 के वे खौफनाक मंजर। मौत के ताण्डव को देख कर धरती का कलेजा फटा जा रहा था वहीं फलक भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया और दिन ढलते ही आसमानी बूंदे टपक पड़ीं।

बता दें कि हल्दी थाना क्षेत्र के ओझवलिया घाट पर 14 जून 2010 दिन सोमवार को गंगा में हुई नाव दुर्घटना में 62 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। हादसे का सबब बनी थी जर्जर नाव जिस पर क्षमता से कहीं अधिक लोग सवार थे। आलम ये था कि नदी से शव बाहर निकाले जा रहे थे तो दूसरी तरफ बगल में ही मृतकों की चिताएं भी जल रही थीं। मौत ने इसके पहले भी खेल गंगा की लहरों में ही 17 अक्टूबर 2005 को खेला था जब फेफना थाना क्षेत्र के छप्पन के डेरा गांव में मजदूरों से भरी नाव पलट गयी थी। इस नाव पर सवार होकर परवल की रोपाई करने जा रहे 46 मजदूर काल के गाल में समा गये थे। उस समय भी हर तरफ फैली लाशें और उसके आस पास विलाप करते परिजनों को देख उस दियारे का भी कलेजा फट गया था। ओझवलिया में जहां घटना के बाद लोग काफी देर तक प्रशासन का मुंह ताकतें रहे वहीं छप्पन के डेरा की घटना में तत्कालीन राजस्व मंत्री और क्षेत्र के विधायक अम्बिका चौधरी के प्रयास से वहां राहत कार्य बहुत तेजी से हुआ। घटनास्थल पर ही मृतकों के शव का पोस्टमार्टम हुआ और मृतकों के परिजनों को शवदाह से पूर्व ही एक-एक लाख रुपये की अहेतुक सहायता प्रदान कर दी गयी थी। ट्रैक्टर ट्राली हादसे में भी मृतकों के शवों के पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेजना प्रशासन ने मुनासिब नहीं समझा और नगरा में ही इसकी व्यवस्था कर दी गयी।

Sunday, August 21, 2011

युवा और देश का इतिहास !

आधुनिक विचारों के धनी भारतीय युवा

युवा किसी भी देश के विकास में महत्वपूर्ण होते हैं, उन्हें अच्छे बनने की प्रेरणा इतिहास से मिलती है। भारत को युवाओं का देश कहा जा सकता है और देश की तरक्की में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। आज ही नहीं, आजादी से पहले ही युवा देश के विकास और आजादी में काफी आगे रहे हैं। देश के पूरे स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं का जोश व मजबूत इरादा हर जगह नजर आया है। चाहें वह महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंहिसात्मक आंदोलन या फिर ताकत के बल पर अंग्रेजों को निकाल बाहर करने का इरादा लिए युवा क्रांतिकारी, सभी के लिए इस दौरान देश की आजादी के सिवाय बाकी सभी चीजें गौण हो गई थीं। स्कूल, कॉलेज राष्ट्रीय गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन रहे थे। इस दौरान शिक्षा का मतलब ही राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली बन गया था। जिसके अंतर्गत अंग्रेजी स्कूलों मिशनरी शिक्षा संस्थानों का बहिष्कार किया गया।

भगत सिंह

23 साल की उम्र बहुत नहीं होती। उम्र के जिस पडाव पर आज के युवा भविष्य, कॅरियर की उधेडबुन में रहते हैं भगत सिंह ने उसी उम्र में अपना जीवन ही राष्ट्र के नाम कर दिया था। दुनिया उन्हें फिलोशफर रिवोल्यूशनर के नाम से जानती है , जो गोली बदूंक की धमक से ज्यादा विचारों की ताकत पर यकीन रखते थे। डीएवी कॉलेज, लाहौर से शिक्षित भगत सिंह अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी, उर्दू पर बराबर अधिकार रखते थे। लेकिन ऐसे प्रतिभावान युवा के लिए जीवन की सुखद राहें इंतजार ही करती रह गई, क्योंकि उनका रास्ता तो कहीं और से जाना तय लिखा था- जी हां, बलिदान की राह का पथिक बन भगत सिंह ने अपना नाम सदा सदा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया और इतने वषरें के बाद भी आज हर युवाओं के धडकन में समाए हुए हैं।

चंद्रशेखर आजाद

छोटी सी उम्र लेकिन हौसले इतने बुलंद कि दुनिया की सबसे ताकतवर सत्ता भी उसके आगे बेबस नजर आई। केवल पंद्रह साल की उम्र में जेल गए, अंग्रेजों के कोडे खाए। फिर तो इस राह पर उनका सफर, शहादत के साथ ही खत्म हुआ। हम बात कर रहे हैं अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की। मां की इच्छा थी कि उनका चंदू, काशी विद्या पीठ से संस्क ृत पढे। जिसके लिए उन्होंने वहां प्रवेश भी लिया, लेकिन नियति ने तो उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।

सुभाष चंद्र बोस

समृद्ध परिवार, असाधारण मेधा , बेहतर शक्षिक माहौल। कहने के लिए तो एक शानदार कॅरियर बनाने की वो सारी चीजें उनके पास मौजूद थी, जिनकी दरकार छात्रों को होती है। लेकिन सुभाष ने वो चुना जिसकी जरूरत भारत को सर्वाधिक थी। आजादी की। 1918 में सुभाष चंद्र बोस ने स्कॉटिश चर्च कॉलेज (कलकत्ता यूनिवर्सिटी) ने स्नातक किया। उसके बाद आईसीएस की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। वो चाहते तो एक सुविधाजनक, एशोआराम का जीवन उनके कदमों पर होता। लेकिन इसे ठुकराकर उन्होंने देश की स्वतंत्रता का संघर्षमय मार्ग चुना। पूरी दुनिया की खाक छानी, फंड जुटाया, आईएनए का गठन किया और ब्रिटिश शासन की जडें हिला दीं।

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद के पास 1884 में वेस्टर्न फिलॉसपी में बीए करने के बाद विकल्पों की कमी नहीं थी, लेकिन उनका संकल्प तो राष्ट्र सेवा था। उन्होने निराशा में गोते लगा रहे युवा वर्ग को उस समय उठो जागो लक्ष्य तक पहुंचे बिना रूको मत का मंत्र दिया तो वहीं भारत की गरिमा दोबारा स्थापित की। भारत में उनका जन्म दिवस 12 जनवरी युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। अरविंद घोष, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे बहुत से लोगों को इस सूची में स्थान दिया जा सकता है।

Monday, August 8, 2011

रेशम की डोर से बंधा नेह भरा नाता !

मिला बहनों का भरपूर प्यार

राजीव वर्मा, अभिनेता

अगर दिल में एक-दूसरे के लिए नि:स्वार्थ प्रेम हो तो यह बात कोई मायने नहीं रखती कि कोई आपका सगा भाई/बहन है या नहीं? वैसे मेरी दो सगी बहनें हैं, जिनके साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं। इसके अलावा मेरी कुछ मुंहबोली बहनें भी हैं। फोन या ई-मेल के जरिये उनके साथ मेरा संपर्क आज भी बना हुआ है। किसी भी रिश्ते में सहजता और प्यार होना चाहिए। सिर्फ रस्म अदायगी से बात नहीं बनती। मेरी बहनें अगर किसी वजह से मुझे राखी नहीं भेज पातीं और उस दिन केवल मुझसे फोन पर बात कर लेती हैं तो वह भी मेरे लिए काफी होता है।

वक्त के साथ मजबूत हुआ रिश्ता

गुन कंसारा, टीवी कलाकार

मेरा कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन अपने चाचा के बेटे तुषार को मैं बचपन से राखी बांधती आ रही हूं। वह मेरे लिए सगे भाई से भी बढकर है। मैं उस पर अपना पूरा हक समझती हूं और रक्षाबंधन वाले दिन मैं उससे अपनी पसंद का गिफ्ट लडकर भी मांग लेती थी। अब करियर के लिए मैं अपना होम टाउन चंडीगढ छोडकर मुंबई आ गई और पहले की तरह हमारा मिलना-जुलना नहीं हो पाता। फिर भी मैं उसके लिए राखी जरूर भेजती हूं और वह भी मेरे लिए गिफ्ट भेजना नहीं भूलता। मुझे ऐसा लगता है कि अगर भाई-बहन के बीच सहज संबंध हो तो दूर रहने के बावजूद वक्त के साथ उनके रिश्ते में और भी मजबूती आ जाती है।

खूबसूरती से संजोया है रिश्ते को

मालिनी अवस्थी, गायिका

वैसे तो मेरे सगे भाई मुझसे बडे हैं और बचपन से आज तक मुझे उनका भरपूर स्नेह मिलता रहा है, लेकिन शादी के बाद राखी और भइया दूज जैसे त्योहारों पर मन में एक कसक सी रह जाती थी कि काश! आज भइया मेरे साथ होते। आज से लगभग 14 वर्ष पहले जब मेरे पति की पोस्टिंग फैजाबाद जिले में थी, तब कुछ ऐसा संयोग हुआ कि वहां संगीत और साहित्य में रुचि रखने वाले, अयोध्या के विमलेंद्र प्रताप मोहन मिश्र से मेरी मुलाकत हुई। पहली ही नजर में वह मुझे बडे अपने से लगे। अनायास ही उनके लिए मेरे मुंह से भइया संबोधन निकल गया। उसी दिन से वह मेरे राखी भाई बन गए। आज भले ही मैं दिल्ली आ गई हूं, लेकिन हमारा यह प्यार भरा नाता आज भी बरकरार है। हम दोनों ने इस रिश्ते को बडी खूबसूरती से संजोकर रखा है।

संभाल कर रखता हूं राखियां

जतिन कोचर, फैशन डिजाइनर

हमारे परिवार में लडकियां बहुत कम हैं, पर मेरी बुआ की बेटी कनुप्रिया मेरी सबसे लाडली बहन है। हमउम्र होने की वजह से हमारा रिश्ता बेहद दोस्ताना रहा है। इस रिश्ते का प्यार आज भी वैसे ही बरकरार है, जैसा कि पहले था। अब उसकी शादी हो चुकी है और वह सिंगापुर में रहती है। दो साल पहले मैं सपरिवार वहां छुट्टियां बिताने गया था। वह मेरे बच्चों की सबसे प्यारी बुआ है। वह हर साल मेरे लिए कोरियर से राखी की थाली भेजना नहीं भूलती। भले ही मैं गिफ्ट देने में देर कर दूं, पर उसकी राखी हमेशा समय से पहले पहुंच जाती है। मेरी सारी कजन्स मुझसे छोटी हैं। एक छोटी बहन हर साल मेरे लिए अपने हाथों से राखी बनाकर लाती है। मैं अपनी सारी राखियां संभाल कर रखता हूं। आजकल राखियां डोरीनुमा शेप में होती हैं, इसलिए बाद में मैं उन्हें अपने जरूरी कागजात के साथ बांध देता हूं, ताकि मेरी बहनों की शुभकामनाएं हमेशा मेरे साथ रहें।

खून का नहीं दिल का रिश्ता

मैत्रेयी पुष्पा, साहित्यकार

मैं अपनी मां की इकलौती संतान हूं। जब मेरी उम्र डेढ वर्ष थी तभी मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया था। मां ग्रामसेविका थीं। हमेशा उनका तबादला एक से दूसरे गांव में होता रहता था। उन्हें मेरी पढाई की बहुत चिंता रहती थी। वह किसी भी हाल में मुझे पढाना चाहती थीं। जब उनकी पोस्टिंग झांसी के पास खिल्ली गांव में थी, तब वहां के एक किसान परिवार से उनके बडे आत्मीय संबंध थे। वहां से जब मां का तबादला दूसरी जगह हो गया तो उन लोगों ने कहा- पुष्पा को यहीं हमारे पास रहने दो। तब मां को भी ऐसा लगा कि बार-बार जगह बदलने से मेरी पढाई का नुकसान होगा। इसलिए उन्होंने मुझे पढने के लिए उन्हीं के घर पर छोड दिया। उनके यहां कोई बेटी नहीं थी। इसलिए वहां मुझे मेरे पांच मुंहबोले भाई मिले। रक्षाबंधन वाले दिन पांचों भाई सुबह तैयार होकर मुझसे राखी बंधवाने के लिए एक कतार में बैठ जाते थे। मैंने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास कस्तूरी कुंडल बसे में उनके बारे लिखा भी है कि युवराज और रतन सिंह जैसे भाई किसके होंगे? अब तो मेरी मां नहीं रहीं, लेकिन आज भी मेरा भरापूरा मायका कायम है। मेरी बेटियों की शादी में उन्होंने बडे उत्साह से आगे बढकर मामा के रस्मों का निर्वाह किया। मैं अकसर अपने भाइयों से कहती हूं कि खून का रिश्ता नहीं है तो क्या हुआ हमने पानी तो एक ही घर का पीया है।

सुरों का मधुर बंधन

जब भी राखी भाई-बहन के रिश्ते की बात चलती है तो सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर से जुडे कई प्रसंग याद आ जाते हैं। अभिनेता दिलीप कुमार उनके राखी भाई हैं। सन 2000 में प्रसारित टेलीविजन शो इस दुनिया के सितारे के एक एपिसोड में दिलीप कुमार को राखी बांधते हुए लता जी ने कहा था, अब तक तो सिर्फ हम ही जानते थे कि हम दोनों राखी भाई-बहन हैं, पर आज से दुनिया जानेगी। उनका यह स्नेह भरा रिश्ता आज भी बरकरार है। इसके अलावा गायक मुकेश और संगीतकार मदन मोहन को भी लता जी अपना भाई मानती थीं। मुकेश को वह हमेशा मुकेश भइया कहती थीं और उन्हें राखी बांधती थीं। यह कैसा दुखद संयोग था कि लता जी अपने इस भाई के अंतिम समय में उनके साथ थीं। अगस्त 1976 मुकेश और लता जी एक स्टेज शो में अमेरिका गए थे। वहीं दिल का दौरा पडने से उनका निधन हो गया। वहां लता जी के साथ स्टेज पर गाए गए उनके दो अंतिम गीत थे- सावन का महीना पवन करे सोर.. और कभी-कभी मेरे दिल में..। मुकेश और दिलीप कुमार की तरह लता जी के तीसरे भाई थे- संगीतकार मदन मोहन। उनके संगीत निर्देशन में लता जी ने तमाम सुरीले गीत गाए। चाहे वह फिल्म अनुपमा का गीत धीरे-धीरे मचल.. हो या अनपढ का दर्द भरा गीत आपकी नजरों ने समझा. मदन मोहन का बेहतरीन संगीत निर्देशन और लता जी की सधी हुई आवाज ने इन गीतों को अमर बना दिया। इन अच्छे गीतों के लिए वह डांट सुनने को भी तैयार रहती थीं। इस इंडस्ट्री में अगर कोई उन्हें डांट सकता था तो वह सिर्फ मदन मोहन जी ही थे। लता जी अपने इस भाई से डांट इसलिए सुनती थीं क्योंकि गीत में बोल के हिसाब से भाव नहीं आ पाते थे। जब तक मदन मोहन जीवित रहे, लता जी उन्हें राखी बांधती रहीं। यह सोचकर बडा ताज्जुब होता है कि ग्लैमर की इस दुनिया में भी पहले इतने सीधे-सच्चे रिश्ते हुआ करते थे। आज से कुछ साल पहले लता जी ने फिल्म पेज 3 के लिए एक गीत गाया था- कितने अजीब हैं रिश्ते यहां के..। इस गीत में आज के बनावटी रिश्तों की बात है और इसकी रिकॉर्डिग के दौरान उन्होंने इसके गीतकार संदीपनाथ से कहा था, तुम आज से चालीस साल पहले इंडस्ट्री में क्यों नहीं आए..?

Friday, August 5, 2011

भारत देश महान बा, जानत सब जहान बा ना..

पूर: क्षेत्र के ग्राम पहराजपुर में संत यती नाथ लोक सांस्कृतिक संस्थान सुखपुरा के बैनर तले आयोजित कजरी संध्या में गायकों ने कजरी के विभिन्न रूपों व रसों का रसास्वादन कराया जिस पर श्रोता देर रात तक झूमते रहे। राजीव भारद्वाज की सरस्वती वन्दना से शुरू कजरी संध्या में संगीत अध्यापक व गायक अरविन्द उपाध्याय ने 'झूला झूलवारी भवानी संग में भोलादानी ना' सुना कर श्रोताओं को शिव भक्ति की तरफ मोड़ दिया। इसी बीच आकाशवाणी कलाकार राजनारायण यादव ने 'कटे बदरा किलोल उठे जिया में हिलोर रस राते-राते बरसे सवनया में' सुना कर श्रोताओं को श्रृंगार रस में डूबो दिया। दूरदर्शन कलाकार बलिराम यादव ने 'झूला धीरे से झुकाव बनवारी लचवे कदम के डारी ना' से राधा व कृष्ण के प्रेम से श्रोताओं को सरोबार कर दिया। राजेन्द्र सिंह गंवार ने 'मइया अइहे लिवनइया हो, सवनवा में ना जइवो सखिया' से नवविवाहिता के पति प्रेम को प्रदर्शित किया। संत कुमार ने देशभक्ति कजरी 'भारत देश महान बा जानत सब जहान बा ना' से श्रोताओं में देशभक्ति का जज्बा भरा। बृजमोहन प्रसाद अनारी ने अपने महाकाव्य 'धरम के धाजा' की कुछ पंक्तियां सुना कर श्रोताओं की खूब वाह-वाही लूटी। बैंजू पर अवधेश जी, आर्गन पर चन्द्रशेखर शर्मा, तबला पर रविकांत, हारमोनियम पर रणविजय यादव व झांस पर विजय सिंह विकल ने संगत किया। इस मौके पर क्षेत्र के गणमान्य नागरिक काफी संख्या में मौजूद रहे।

Thursday, July 28, 2011

कामयाब हो जनपद का मान बढ़ाया !

नगर के मुहल्ला हरपुर निवासी उद्योगपति व समाजसेवी अजय सेठ की पुत्री आयुषी सेठ ने इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ मास कम्यूनिकेशन में प्रवेश पाकर जनपद का मान बढ़ाया है। दिल्ली स्थित आइआइएमसी में पूरे भारत से 45 छात्रों का चयन होना था जिसमें आयुषि भी शामिल है। आयुषि के दादा भुतपूर्व रोटरी क्लब अध्यक्ष अशोक सेठ व बलिया जर्नलिच्म एसोसिएशन ने सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त किया है।

Monday, July 25, 2011

सहज सरल व्यक्तित्व के धनी रहे पंडित परशुराम !

सोमवार को चलता पुस्तकालय सभागार में सायं बलिया हिन्दी प्रचारिणी सभा द्वारा डा.रघुवंश मणि पाठक की अध्यक्षता में आचार्य पं.परशुराम चतुर्वेदी की जयंती समारोहपूर्वक मनायी गयी। संचालन डा.शत्रुघ्न पांडेय ने किया। प्रो.रामसुन्दर राय ने वाणी वंदना प्रस्तुत की। आचार्य चतुर्वेदी के व्यक्तित्व एवं कृतीत्व पर प्रकाश डालते हुए अध्यक्ष डा.रघुवंश मणि पाठक ने कहा कि उनका व्यक्तित्व सहज था। वे सरल स्वभाव के थे। स्नेह और सौहार्द के प्रतिमूर्ति थे। इकहरा शरीर, गौरवर्ण, मध्यम कद काठी और सघन सफेद मूंछें उनके बड़प्पन को प्रकाशित करने केलिये पर्याप्त थीं। उनके मुख मंडल पर परंपरागत साहित्य की कोई विकृति की रेखा नहीं देखी गयी बल्कि एक निश्चित दीप्ति सदा थिरकती रही जिससे बंधुता एवं मैत्री भाव विकीर्ण होता रहता था। चतुर्वदी जी महान अन्नवेषक थे। मनुष्य की चिंतन परंपरा की खोज में उन्होंने संत साहित्य का गहन अध्ययन किया। वे मुक्त चिंतन के समर्थक थे इसलिये किसी सम्प्रदाय या झंडे के नीचे बंधकर रहना पसंद नहीं किया। साहित्य में विकासवादी सिद्धांत के पक्षधर थे। डा.शत्रुघ्न पांडेय ने कहा कि उनकी विद्वता के आगे बड़े-बड़ों को हमेशा झुकते देखा गया है। पं.शंभूनाथ उपाध्याय ने कहा कि उनका जीवन मानवता के कल्याण के प्रति समर्पित था। ध्रुवपति पांडेय ध्रुव ने कहा कि चतुर्वेदी जी का जीवन ही अपने आप में साहित्य है। डा.भरत पांडेय, डा.दीनानाथ ओझा, अशोक जी, डा.इन्द्रदत्त पांडेय, बृजमोहन प्रसाद अनारी, त्रिभुवन प्रसाद सिंह प्रीतम, बरमेश्वर प्रसाद वर्मा, एजाज बलियावी, सत्य स्वरूप चतुर्वेदी, रामानंद सिंह, अनंत प्रसाद रामभरोसे, शिवजी पांडेय, महावीर प्रसाद गुप्त, कैस तारविद, डा.जनार्दन चतुर्वेदी ने अपने वक्तव्य व रचनाओं से सभी को विभोर कर दिया। उक्त के अतिरिक्त सभा में श्रीकृष्ण कुमार सिंह, राधाकृष्ण उपाध्याय सहित अनेक नागरिक उपस्थित थे।


सांसद ने घर पहुंच दी भावांजलि

आचार्य पं.परशुराम चतुर्वेदी के 117 वें जन्मदिवस पर सांसद नीरज शेखर ने उनके हरपुर स्थित आवास परशुराम पुरी पहुंच कर उनके चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित किया। संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य जी की स्मृतियों को याद करते हुए सांसद द्वारा उनके पुत्र रिपुंजय चतुर्वेदी (पूर्व ग्राम प्रधान जवहीं), पुत्री मीरा तिवारी एवं सेवक जमुना प्रसाद को अंगवस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया गया। रिपुंजय चतुर्वेदी द्वारा ग्राम जवहीं को बिजली पहुंचाने और पुल के माध्यम से सड़क द्वारा जोड़ने के अनुरोध पर सकारात्मक प्रयास करने का आश्वासन दिया। इससे पहले परशुराम पुरी पहुंचने पर आचार्य जी के परिवार की ओर से सत्य स्वरूप चतुर्वेदी एवं अतुल तिवारी द्वारा माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। इस अवसर पर जनपद के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव चतुर्वेदी, संतोष राय, श्रीनिवास राय, अजय कुंवर, एचएन उपाध्याय, पूर्व चेयरमैन जवाहर प्रसाद, अजय तिवारी, समर बहादुर सिंह, रघुपति जी, बबलू तिवारी आदि उपस्थित थे।

Saturday, July 23, 2011

पिया सावन में कजरी सुनावे झूला झुलावे चल ना ..

जब गांवों में 'हरि हरि कृष्ण बनेले मनिहारी पहिरि लिहले साड़ी ए हरी..।पिया सावन में कजरी सुनावे झूला झुलावे चल ना..।' जैसे कर्णप्रिय कजरी सुनाई देने लगता था तो लोगों को एहसास हो जाता था कि मन भावन सावन का महीना आ गया है। इस जमाने में क्या सावन, क्या भादो न तो कहीं गांवों में महिलाएं कजरी गाते दिखती हैं न ही पेड़ की डालों पर अब झूले ही दिखाई दे रहे है। सावन के महीने में पड़ती रिमझिम फुहार और उसमें भीगती खेतों की निराई-गुड़ाई करती महिलायें जब कजरी गाती थीं, तो मन बाग-बाग हो जाता था। अब समय के साथ सब कुछ बदल सा गया है। अब इस तरह के पारम्परिक गीतों का ह्रास होने लगा है। सावन के महीने में कजरी का विशेष महत्व है। वर्षो पहले गांव की युवतियां जब हाथों में मेंहदी लगाकर झूला झूलते समय कजरी गाती थीं तब मन मयूर नाच उठता था। बुजुर्गो का कहना है कि पारम्परिक गीतों का ह्रास होना भारतीय संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है।

'कइसे खेले जइबू सावन के कजरिया, बदरिया घेरि आइल ननदी', पिया मेंहदी ले आइ द मोती झील से, जाके साइकिल से ना, 'आरे रामा सावन में लागे सोमारी, सोमारी देखे जाइब ए हरी'। सावन का महीना चल रहा है। सावन के महीने में कजरी, झूला व मेहंदी का गजब का संयोग है। इन तीनों के अभाव में सावन का महत्व ही समाप्त हो जाता है। सावन के सुहावने मौसम में झूला झूलती कजरी गाती हुयी हाथों पर मेंहदी रचाई हुयी युवतियों का झुंड नजर नहीं आता है।

Tuesday, July 12, 2011

ठिकाना तो मिल गया पर परिजन नहीं !

नैतिक मूल्यों में आयी गिरावट के बावजूद समाज में कुछ ऐसे लोग हैं जो बेसहारों का सहारा बन उनकी जिन्दगी की नैया पार लगाने को कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। उदाहरण के तौर पर एक अध्यापक को लिया जा सकता है जिसने एक गूंगी युवती को न सिर्फ मनचलों के चंगुल में आने से बचाया अपितु पुलिस को संज्ञान में देकर उसे अपने घर में शरण भी दी। यह युवती अपने परिजनों के बारे में लिखित रूप से भी कोई जानकारी नहीं दे पा रही है। गूंगी युवती को परिजनों तक पहुंचाने के लिए नरहीं पुलिस पांच दिनों से भटक रही है। घटना चौरा गांव के सामने की है। बीते गुरुवार की शाम को लगभग 22 वर्षीय गूंगी युवती सड़क के किनारे बैठी रो रही थी। कुछ मनचले भी उसके इर्द गिर्द मंडरा रहे थे। इसी बीच बाइक से जनता उमावि सिंहपुर से शिक्षण कार्य पूरा कर लौट रहे भीम सिंह निवासी चौरा की नजर उस पर पड़ी। उनको करीब आता देख मनचले भाग खड़े हुए। उन्होंने सड़क के किनारे रो रही युवती से पूछने का प्रयास किया लेकिन वह कुछ भी नहीं बता सकी। उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को दी और उसे बाइक पर बैठा अपने घर लेते आये। संज्ञान में आते ही नरहीं थानाध्यक्ष बकरीदन अली तत्काल मौके पर पहुंच गये। उन्होंने भी उस युवती के बारे में जानकारी लेने का प्रयास किया। इस दौरान युवती के झोले में तीन सेट कपड़ा मिला। झोला पर नेहा गारमेंट्स बांसडीह सब्जी मण्डी मोड़ बड़ी बाजार लिखा हुआ है। पुलिस वहां भी पहुंची लेकिन परिजनों के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिल सकी।

गूंगी युवती का हर कोई कायल

भटकती मिली गूंगी युवती का भीम सिंह के घर का हर कोई कायल है। उसकी रहन-सहन व काम करने के तरीके से अध्यापक का परिवार उसे अब अपनी बेटी की तरह मानने लगा है। उसके व्यवहार से ऐसा लगता है कि वह किसी सांस्कारिक परिवार की है। अध्यापक भीम सिंह ने बताया कि यह युवती खाना साफ सुथरा व अच्छा बना ले रही है। वह भी इसके परिवार वालों से मिलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं।