Thursday, December 22, 2011
बलिया का दुर्गेश प्रदेश थ्रो बाल टीम में !
Monday, December 19, 2011
कर्म की महत्ता बताने पृथ्वी पर आते हैं भगवान !

मानव जाति को सत् मार्ग से विमुख करने वाले असुर प्रवृतियों को तो भगवान बैकुण्ठ में बैठे-बैठे ही समाप्त कर सकते हैं पर बार-बार धरती पर आकर वे धर्म की महत्ता को सिद्ध करते हैं। उक्त बातें श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन सोमवार को रामानुजाचार्य जगतगुरु स्वामी श्रीधराचार्य जी महराज ने प्रवचन के दौरान कहीं। रामलीला मैदान के प्रांगण में श्री बलिया सत्संग सेवा समिति के बैनर तले आयोजित श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में उमड़े भक्तों के सैलाब के समक्ष संत श्री ने कहा कि जब-जब धर्म की क्षति व मानव को अपने कर्म की राह में विमुख करने वाली शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ भगवान को धरती पर आना पड़ा। भगवान का रामावतार कर्मयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। कथा में संतश्री ने भगवान श्री कृष्ण के जन्म और बालपन की लीलाओं का वर्णन कर भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूतना वध के प्रसंग को भी बड़े मनोहर ढंग से प्रस्तुत किया। कृष्ण के अवतार को बताते हुए कहा कि कंस ने जब मानवता को खत्म करने का प्रयास किया तो भगवान को अवतार लेना पड़ा। कंस के सहभागियों को बारी-बारी मारकर भगवान ने यह बताने का भी प्रयास किया कि बुराई एक बार में ही समाप्त नहीं होती उसे व्यवस्था से भगाना पड़ता है। कथा के यजमान डीपी ज्वेलर्स रहे।
दो कुल संवारती हैं बेटियां
भागवत कथा के दौरान संत श्री ने समाज की एक प्रमुख बुराई भ्रूण हत्या पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि आज के लोग कोख में बेटियों को मारने से परहेज नहीं कर रहे पर वे भूल जाते हैं कि बेटा कितना भी लायक हो तो एक कुल का ही मान बढ़ाता है किन्तु काबिल बेटी दो कुलों को सुशोभित करती है।
निकाली कृष्ण जन्म की झांकी
श्रीमद् भगवत कथा के चौथे दिन शाम को संत श्रीधराचार्य के साथ आयी टीम ने भगवान श्री कृष्णा के जन्म की मनोहर झांकी प्रस्तुत की।
Sunday, December 18, 2011
कभी भक्त वत्सल को सच्चे दिल से बुलाओ तो !!!!!
Thursday, December 1, 2011
रामचरित मानस कहने व सुनने मात्र से सुधर जाता इहलोक- परलोक !

Thursday, November 24, 2011
राष्ट्रीय विकलांग तैराकी में जलवा दिखाएगा बलिया का लक्ष्मी साहनी !
Monday, November 21, 2011
ज्ञानदीप से आलोकित हो रहा तकनीकी शिक्षा जगत !
ददरी मेले के भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस हलकान !
ऐतिहासिक ददरी मेले के मीना बाजार में छुट्टी के दिन रविवार को लोगों की काफी भीड़ रही। लोगों ने सामानों की जमकर खरीदारी की। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस पूरे दिन कसरत करती रही। ग्रामीण क्षेत्र के लोग सुबह 9 बजे ही मेले में पहुंच गये। दोपहर बाद तो मेले में काफी भीड़ हो गयी। लोग एक दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते रहे। झूला, जादू, डांस आइटमों पर युवा वर्ग की जमात अपने नंबर का इंतजार करती रही। मेले में पहली बार इतनी भीड़ देखी गयी। लोगों ने सामान की खरीदारी तो की ही, विभिन्न आइटमों का भी आनंद लेते रहे। महिलाओं ने घरेलू व अपने श्रृंगार के सामान की खरीदारी की। गरम कपड़ों की दुकानों पर भी अच्छी खासी भीड़ लगी रही। मेले में दोपहर बाद शहर व आसपास के लोग भी वाहनों से अपने परिवार के साथ निकल पड़े। मेले में उमड़ी भीड़ को देख दुकानदारों के भी चेहरे चहक गये थे। नगर पालिका ने मेले में दुकानों की संख्या बढ़ा दी है। मेले के दोनों मार्गो के बीच मे भी ठेला समेत फुटपाथ की दुकानें लगी हैं। मेला प्रभारी विमलेंदु अपने सहयोगियों के साथ कभी पैदल तो कभी घोड़े पर सवार होकर भीड़ को नियंत्रित करते रहे। वहीं चर्खी व अन्य आइटमों के पास पुलिस के जवान काफी सतर्क दिखे।
बिछड़ों को मिलाती रही पुलिस
मेले में बिछड़ों को उनके परिजनों से पुलिस मिलाती रही। इसके लिए तीन जवान पूरी तरह से डटे रहे। मेले के अंदर सबसे अधिक बच्चे परिवारवालों से बिछड़े। पुलिस ने करीब एक दर्जन बिछड़ों को उनके परिवार वालों से मिलाया। दुबहर थाना क्षेत्र के बैजनाथ छपरा निवासी बृजेश यादव की पुत्री कुसुम यादव (5) अपनी मां से बिछड़ गयी थी। इसको लेकर जवान काफी परेशान रहे। मेले में माइक से इसकी सूचना प्रसारित की गयी। काफी प्रयास के बाद उस लड़की की एक परिचित महिला मिली। देर शाम को उसके परिवार वाले पहुंच गये।
फ्री आइटम व सेल सामानों की लूट
मेले में एक से एक आइटम आये हुए हैं। इसमें बाम्बे की साड़ी की दुकान पर दस खरीदने पर एक फ्री, एक की कीमत 75 रुपये पर लूट सी मची रही। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं ने इसकी खूब खरीदारी की। कुछ इसी तरह की छूट कंघी, बैग, कप, गिलास समेत आदि सामान पर भी रही। वहीं हरेक माल दस रुपये व 25 रुपये की दुकानों पर भी भीड़ रही। इसके अलावा सेल के सामान की दुकानों पर भी लूट मची रही।
झूले पर खड़े होनेवालों की अब खैर नहीं
मेले में लगे चर्खी पर खड़े होकर झूलने वालों की अब खैर नहीं। तीन दिन पूर्व झूले से युवक व युवती के गिरने की घटना को देखते हुए पुलिस ने यह सख्त कदम उठाया है। मेला प्रभारी विमलेंदु ने बताया कि इसके लिए झूले वालों को भी निर्देश दिया गया है।
लकड़ी के सामानं की हुई खूब बिक्री
ददरी मेला के मीना बाजार में लकड़ी के बने सामानों की जमकर बिक्री हो रही है। इसके अलावा लोग बड़े-बड़े बक्सों की खरीदारी में भी दिलचस्पी ले रहे हैं। मेले में लोगों ने जमकर खरीदारी की। साथ ही फूल-पौधे भी ले गये। इन दिनों मेला पूरे शबाब पर है। मेले में कानपुर व सहारनपुर समेत अन्य जनपदों के व्यापारी लकड़ी की दुकानें लगाये हुए हैं। पलंग, चौकी, मेज, सोफा सहित अन्य सामान की खरीदारी कुछ ज्यादा ही हो रही है। मेले में आलमारी, छोटे-बड़े बक्से की दुकानें भी लगी हैं। गांव से आये लोगों ने इन सामानों की खरीदारी में ज्यादा रुचि दिखायी।
Sunday, November 13, 2011
अपने अंदर की कमी देखें दूर हो जायेगी अशांति !
Wednesday, November 9, 2011
दस वर्ष पुराना है बलिया में गंगा महाआरती का इतिहास !

Monday, November 7, 2011
कॅरियर ऑन क्लिक !

आज जो समय के साथ कदम ताल कर सकता है, वही कामयाब है। जो इससे जरा सा भी पिछडा, उसको फर्श पर पहुंचते देर नहीं लगती। जिस टेक्नोलॉजी के बूते भारत ने कभी तरक्की का ककहरा सीखने की शुरुआत की थी, आज वही टेक्नोलॉजी देश की कामयाबी के महाग्रंथ रच रही है। केवल देश की तरक्की ही क्यों, रोजमर्रा की जिंदगी में भी इसने अपना मुकम्मल असर छोडा है। ऑफिस, घर, डिपार्टमेंटल स्टोर, स्कूल कॉलेज सभी जगह आईटी आज की जरूरत बन चुकी है। उन्नत आईटी सेवा की बदौलत आज विश्व की प्रमुख परीक्षाओं के साथ-साथ भारत में भी सभी प्रमुख परीक्षाएं ऑनलाइन हो रही हैं। जीमैट, जीआरई, टॉफेल के अलावा कैट, इंजीनियरिंग, लॉ, सीटीईटी सभी परीक्षाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं या होने की तैयारी में है। विशेषज्ञों के अनुसार आनेवाले समय में यही एकमात्र परीक्षा का तरीका होगा। यही कारण है कि सभी संस्थान इस नई परीक्षा प्रणाली को लागू कर रहे हैं।
नई जेनरेशन, नई परीक्षा
भारत में ऑनलाइन का प्रचलन तेजी से बढ रहा है। चाहे आपको टिकट की बुकिंग करानी हो, बैंक से पैसे का ट्रांजैक्शन करना हो या फिर चैटिंग करनी हो-ये सभी काम आप आनॅलाइन के माध्यम से कर सकते हैं। इसकी विशेषता को देखते हुए अब ऑनलाइन एग्जाम भी देश की कई परीक्षाओं में शुरू हो गए हैं। सरल शब्दों में कहें तो ऑनलाइन एग्जाम एक नई तकनीक है, जिसमें इंटरनेट की मदद से आप परीक्षा दे सकते हैं। बस इसमें आपके पास लॉग इन आईडी व पासवर्ड की जरूरत होती है, जो सामान्यतय: एडमिनस्ट्रेटर प्रदान करता है। हां तेज नेवीगेशन के लिए आपका कंप्यूटर फै्रंडेली होना जरूरी है। इसमें इतनी आसानी रहती है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग भी इस परीक्षा को आसानी से दे सकते हैं।
कंप्यूटर पर होते हैं एग्जाम
ऑनलाइन एग्जाम के तहत स्टूडेंट्स को परीक्षा देने शहर के किसी खास सेंटर पर जाना होता है, जहां कंप्यूटर खोलने पर उसके सामने प्रश्नों का एक सेट आ जाता है। ये प्रश्न ऑब्जेक्टिव टाइप होते हैं, जिनमें चार उत्तरों में से किसी एक को चुनना होता है। कई बार प्रश्नपत्र के एक से अधिक खंड होते हैं। इनमें से आप अपनी पसंद के अनुसार खंड चुन सकते हैं। सभी प्रश्नों को हल करने के लिए निर्धारित समय-सीमा होती है। यह सीमा खत्म होते ही पेपर अपने आप क्लोज हो जाता है। ऑनलाइन एग्जाम के लिए सेंटर पर इंस्ट्रक्टर उपस्थित होते हैं, जो कोई परेशानी होने पर उसे दूर करते हैं, लेकिन इस तरह का एग्जाम देने के लिए स्टूडेंट्स यदि कंप्यूटर पर पहले से प्रैक्टिस कर लें तो बेहतर होगा।
बेहतर टेक्नोलॉजी, बेहतर रिजल्ट
परीक्षार्थियों की लगातार बढती संख्या के कारण रिटेन एग्जाम लेना कठिन होता जा रहा है। उस पर लगने वाला समय, बढते वित्तीय बोझ के कारण शिक्षा संस्थान व रिक्रू टर दोनों ही पिछले कुछ समय से नए विकल्प की तलाश कर रहे थे। ऑनलाइन एग्जाम इस मामले में उन्हें सटीक ऑप्शन देता है, जहां आप इंटरनेट पर देश-दुनिया के किसी भी संस्थान के लिए इंट्रेस एग्जाम दे सकते हैं, नौकरी के लिए इंटरव्यू दे सकते हैं, सेमेस्टर एग्जाम दे सकते हैं आदि। दूसरी ओर इसका फायदा उन संस्थानों को भी मिल रहा है, जो कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। इसके अलावा समय की बचत, किफायती व सुविधाजनक होने के नाते इन दिनों इसकी लोकप्रियता काफी बढ चुकी है।
जरूरत जैसी, एग्जाम वैसा
ऑनलाइन एग्जाम कई मायनों में फायदों का सबब बन रहा है। देखा जाए तो इसमें संस्थान व स्टूडेंट दोनों को ही काफी सुविधा होती है, क्योंकि इसमें न संस्थान को मुद्रित प्रश्नपत्रों, उत्तर पुस्तिकाओं व बडी संख्या में परीक्षकों की जरूरत होती है और न छात्रों को पेन, पेंसिल, स्केल जैसे संसाधनों की। समय की बचत होती है वो अलग से। इसके साथ इसमें एक अन्य फायदा शीघ्र रिजल्ट प्राप्त होना होता है, जहां पेपर देने के ठीक बाद आप अपना स्कोर जान सकते हैं। इसके अलावा लिखित परीक्षा में जहां एक ही तिथि में देश के विभिन्न केंद्रों पर स्टूडेंट्स के बैठने की व्यवस्था करनी होती है, वहीं ऑनलाइन टेस्ट में प्राय: स्टूडेंट्स के लिए एक ही दिन परीक्षा देने की बाध्यता नहीं होती, क्योंकि प्रश्नपत्रों के बहुत सारे सेट होने के कारण सभी स्टूडेंट्स को एक ही दिन ऑनलाइन टेस्ट नहीं देना होता। इस तरह एक ही तिथि में परीक्षा होने के कारण बडी संख्या में स्टूडेंट्स के लिए सीटिंग अरेंजमेंट की व्यवस्था भी नहीं करनी पडती है। यही कारण है कि प्राय: सभी परीक्षाएं ऑनलाइन हो रही है।
आईटी सेक्टर ने बढाई रौनक
भारत कल तक इस क्षेत्र में दोयम दर्जे की हैसियत रखता था, इस समय हर बीतते साल के साथ वह इस सेक्टर का मंझा हुआ खिलाडी बन चुका है। आज हालात यह हैं कि दुनिया के करीब एक चौथाई कंप्यूटर सॉफ्टवेयर व बीपीओ सेवाएं भारत से ही संचालित हो रही हैं। रोजगार देने में भी पिछले कई सालों से यह सेक्टर अव्वल है। ऑनलाइन जैसी तकनीकी सेवाएं इसी आईटी की बदौलत संभव हुई हैं। आज ऑनलाइन एग्जाम से लेकर बाकी ऑनलाइन सेवाओं में हम तेजी से आगे बढ रहे हैं, उसके पीछे आईटी सेक्टर में हमारी तेज ग्रोथ ही जिम्मेदार है। ऑनलाइन एग्जाम की जिम्मेदारी प्राय: कॉम्प्रिहेंसिव टेस्टिंग ऐंड एसेसमेंट सेवा देने वाली कंपनियों को दी जाती है, जिसमें ईटीएस प्रोमैट्रिक,माइक्रोसॉफ्ट इंडिया, एनआइआइटी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
प्रमुख एग्जाम हुए ऑनलाइन
देश में आज ऑनलाइन एग्जाम की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर आयोजित होने वाले कई एग्जाम मसलन, इंजीनिय¨रग, प्रबंधन, बी-एड, लॉ आदि तेजी से ऑनलाइन किए जा रहे हैं। यहां कुछ ऐसीे ही एग्जाम व संस्थान दिए जा रहे हैं, जो ऑनलाइन हो चुके हैं-
अब सीटीईटी भी ऑनलाइन
तकनीक के प्रति युवाओं के बढते रूझान को देखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड सीबीएसई ने इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए होने वाले ऑल इंडिया इंजीनियरिंग इंट्रेंस एग्जाम एआईईईई के बाद अब सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट सीटीईटी को भी ऑनलाइन करने की तैयारी कर ली है। बोर्ड ने दोनों ही परीक्षाओं को प्रोफेशनल मानते हुए इन्हें कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट फॉर प्रोफेशनल एंट्रेस एग्जाम पीईई 2012 की श्रेणी में रखा है। पीईई के आयोजन के लिए बोर्ड ने विभिन्न एजेंसियों से आवदेन मांगे हैं, जो इनका सफल संचालन करने में सक्षम हों। गौरतलब है कि सीबीएसई ने वर्ष 2011 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर एआईईईई को पेपर टेस्ट के साथ-साथ ऑनलाइन भी आयोजित किया था। अब न सिर्फ इसे विस्तार देने की तैयारी की जा रही है, बल्कि 26 जून को पहली बार आयोजित हुए सीटीईटी को भी बोर्ड ऑनलाइन करने की कोशिश में है। कैट के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में हर साल करीब 40 हजार की बढोत्तरी हो रही है। ऑनलाइन व्यवस्था शुरू होने से इस परीक्षा में शामिल होने वाले आवेदकों को खासी सुविधा हो गई है। कैट के लिए जीआरई पैटर्न अपनाया गया है। सभी प्रोफेशनल परीक्षा भी ऑनलाइन हो रही है।
टीचर्स के लिए ई-टीचिंग ट्रेनिंग
आईटी क्षेत्र में हुए हालिया बदलावों को देखते हुए कई बडे संस्थान अध्यापकों की ऑनलाइन टीचिंग की व्यवस्था करा रहे हैं। माना यह जा रहा है इससे अध्यापन कार्य बहुआयामी हो सकेगा, जिसका सर्वाधिक लाभ स्टूडेंट्स को मिलेगा। इस कार्य के लिए उन्होंने कई कंपनियों से हाथ मिलाया है। बकौल यूनिवर्सिटी प्राय: सभी टीचर्स को कम्प्यूटर की बेसिक जानकारी तो है, लेकिन ई-टीचिंग की कामयाबी के लिए उन्हें बाकायदा प्रशिक्षण देना भी जरूरी है। ट्रेनिंग के दौरान उन्हें खास तौर पर यह बताया जाता है कि कैसे इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर स्टूडेंट्स को ज्यादा से ज्यादा फोकस करने में मदद करें। इसके कई फायदे भी नजर आ रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा फायदा यह हो रहा है कि अब स्टूडेंट्स के साथ टीचर भी टेक्नोसेवी हो गए हैं, जिससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बढोत्तरी हो रही है।
आसान है परीक्षा
यह ठीक है कि देश के कई संस्थान अब ऑन लाइन प्रवेश परीक्षा ले रहे हैं तो कई इम्प्लॉयर भी अपने कर्मचारियों के चयन में ऑनलाइन एग्जाम का सहारा ले रहे हैं, लेकिन इससे डरने की जरूरत नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अब तो देश की कई महत्वपूर्ण परीक्षाएं ऑनलाइन हो गई हैं और निकट भविष्य में अन्य परीक्षाएं भी इसी पैटर्न पर आधारित होंगी। इसलिए आवश्यक है कि हर स्टूडेंट ऑनलाइन प्रणाली को अच्छी तरह समझ ले। जो स्टूडेंट्स यह समझते हैं कि उन्हें फिलहाल ऐसी कोई परीक्षा नहीं देनी है, उन्हें भी पहले से इस बारे में सचेत हो जाना चाहिए। वैसे यह परीक्षा बहुत आसान है। अगर आपने कभी कंप्यूटर इस्तेमाल नहीं किया है, तो भी आप इससे एक-दो घंटे में आसानी से परिचित हो सकते हैं। बेहतर होगा कि आप इंटरनेट से प्रैक्टिस सेट लोड कर उसका अधिक से अधिक अभ्यास करें।
करें ऑनलाइन प्रैक्टिस
इन दिनों ऑनलाइन परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन के लिए मॉडल टेस्ट पेपर उपलब्ध हैं, जहां आप एकदम ऑनलाइन एग्जाम जैसी कंडीशन्स में मॉक टेस्ट दे सकते हैं। वे लोग जो ज्यादा कंप्यूटर सेवी नहीं है, उनके लिए ये टेस्ट और भी कारगर हैं। ऐसी कई वेबसाइट्स हैं जहां आपको विभिन्न कंपटिटिव एग्जाम के साथ सीबीएसई (पीसीएम, एसएसटी), जेएनयू, डीयू इंट्रेस के कई मॉडल टेस्ट पेपर हल करने को मिलते हैं। इन साइट्स में
www.wiziq.com
www.tcyonline.com
www.jumbotests.com
आदि प्रमुख हैं।
भाषा सिखाने वाली प्रमुख ऑनलाइन वेबसाइट्स
ऑनलाइन स्पेनिश के लिए वेबसाइट
21 देशों की ऑफिशियल भाषा स्पेनिश का काफी क्रेज है। यह यूरोपीय यूनियन की ऑफिशियल भाषा होने के अलावा संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषाओं में शामिल है। अगर आप भी इस भाषा को सीखना चाहते हैं, तो भारत में इससे संबंधित कई तरह के कोर्स उपलब्ध हैं। अगर आप किसी कारणवश कॉलेज नहीं जा सकते हैं, लेकिन घर बैठे ही स्पेनिश भाषा बोलना और लिखना सीखना चाहते हैं, तो आप इंटरनेट के माध्यम से इस भाषा को आसानी से सीख सकते हैं। इस भाषा को सिखाने के लिए कई वेबसाइट्स उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ पैसे लेकर सिखाती हैं, तो कुछ पर बिना पैसे के आप सीख सकते हैं।
www.studyspanish.com
www.studyspanishonline.org
ऐसी साइट्स हैं, जो आपको ऑनलाइन स्पेनिश सीखने में मदद करती हैं।
अगर सीखनी हो ऑनलाइन अंग्रेजी
अंग्रेजी विश्व की प्राय: सभी देशों में बोली और समझी जाने वाली महत्वपूर्ण भाषा है। अगर अंग्रेजी की बेहतर समझ है, तो आप विश्व के किसी भी कोने में रह सकते हैं और लोगों को अपनी बात बता सकते हैं। भारत में अंग्रेजी का क्रेज सिर चढकर बोल रहा है। कंप्यूटर की अच्छी समझ और बेहतर अंग्रेजी के ज्ञान की बदौलत भारतीय आईटी इंजीनियर प्रमुख कंपनियों की पहली पसंद हैं। यदि आप भी ऑॅनलाइन के माध्यम से अंग्रेजी लिखना और बोलना चाहते हैं, तो आप घर बैठे वेबसाइट के माध्यम से इसका लाभ उठा सकते हैं। वैसे तो अंग्रेजी भाषा सिखाने के लिए कई ऑनलाइन वेबसाइट्स हैं, लेकिनhttp://learnenglish.britishcouncil.org/en/
www.englishlink.com
वेबसाइट्स के माध्यम से आप अंग्रेजी आसानी से बोलने के साथ लिखना भी सीख सकते हैं।
सीखें फ्रैंच ऑनलाइन
विदेश में ऑनलाइन का प्रचलन काफी वर्षो से है। वहां की प्राय: सभी परीक्षाएं ऑनलाइन होती हैं। ऑनलाइन एग्जाम के जरिए आप प्रोफेशनल कोर्सेज व संस्थानों में तो इंट्री ले ही सकते हैं, साथ ही घर बैठे तरह-तरह की विदेशी भाषाएं भी सीख सकते हैं। यदि आप फॉरेन लैंग्वेज सीखने के इच्छुक हैं तो भी ऑनलाइन लर्रि्नग आपको कई विकल्प सुझाती है।
www.clickonfrench.com
एक ऐसी साइट है, जो आपको ऑनलाइन फ्रैंच सीखने में मदद करती है। गौरतलब है कि आज फ्रैंच दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा पढी व समझी जाने वाली भाषा है। खुद भारत में 3000 से ज्यादा फ्रै च कंपनियां काम कर रही हैं। ऐसे में ऑनलाइन फ्रैंच भाषा सीख कर आप खुद के लिए इस दिशा में एक कॅरियर विकल्प जरूर बना सकते हैं। इसके अलावा आप ऑनलाइन के माध्यम से अंग्रेजी भी सीख सकते हैं। इस प्रकार आप घर बैठे ही फ्रैंच सीख सकते हैं।
ध्यान रखने वाली बातें
अगर अपना कंप्यूटर व इंटरनेट कनेक्शन है, तो उस पर संबंधित विषयों के प्रैक्टिस सेट डाउनलोड करके उन्हें हल करने का बार-बार अभ्यास करें। ऐसे कई सेट विभिन्न साइटों से मुफ्त मिल सकते हैं। ल्ल अगर आपके पास अपना कम्प्यूटर व नेट कनेक्शन नहीं है, तो आप नजदीक के किसी साइबर कैफे में जाकर वहां इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
वे लोग जो पहली बार ऑनलाइन पेपर दे रहे हैं, हो सकता है कि उनको यह टेस्ट देने में कठिनाई हो। ऐसे में इससे परिचित होने के लिए कंप्यूटर पर प्रैक्टिस जरूर करनी चाहिए, अन्यथा स्टूडेंट्स का प्रदर्शन 20 से 25 फीसदी तक प्रभावित हो सकता है।
पहले अपने विषयों को कंपलीट करें और उसके बाद कंप्यूटर पर अभ्यास करें, क्योंकि ऑनलाइन टेस्ट में पूछे जाने वाले प्रश्न पहले की तरह आपके कोर्स पर ही आधारित होंगे।
Wednesday, October 26, 2011
....और सितारे उतर आये जमीं पर !

Wednesday, October 19, 2011
सेनानी डॉ. योगेन्द्र का निधन !
करुणा की प्रतिमूर्ति थे बाबा पशुपतिनाथ !
Friday, September 30, 2011
राजा सूरथ ने बनवाया था शांकरी मंदिर !

Wednesday, September 28, 2011
नदी में बहती आयीं और डेरा जमाया उजियार में !

Wednesday, September 21, 2011
भटकती बालिका को कामू शेख ने दी शरण !
Monday, September 19, 2011
नीदरलैण्ड अधिवेशन में डॉ.गोपाल तिवारी भी करेंगे शिरकत !

Sunday, September 11, 2011
दैनिक जागरण की खबरें बनीं आकर्षण का केन्द्र !

सेंट जेवियर्स स्कूल में रविवार को भी हस्तनिर्मित वार्षिक कला प्रदर्शनी की धूम रही। इस दौरान बड़ी संख्या में अभिभावकों ने कलाकृतियों का अवलोकन किया एवं जमकर सराहना की।
प्रदर्शनी के दूसरे दिन दैनिक जागरण अखबार के विभिन्न खबरों की भी प्रदर्शनी लगी जो विशेष आकर्षण का केन्द्र रही। विद्यालय के छात्रों द्वारा स्थानीय स्तर की बड़ी खबरों की कतरन के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन अभियान संबंधित जागरण की तमाम प्रस्तुतियों को सलीके से प्रदर्शित किया गया था। इसमें सर कटा सकते है लेकिन.., दबंग अन्ना: मन बलवान लागे चट्टान के अलावा हाल-ए-अन्ना आदि विशेष चर्चा में रहीं। वहीं वर्ष की सबसे बडे़ सड़क हादसे की गवाह बनी ट्रैक्टर-ट्राली दुर्घटना की प्रदर्शनी भी क्षेत्र के दर्द को बयां कर रही थी। रो पड़ा फलक फटा धरती का कलेजा, मंदिर की डगर में नाची मौत की रपट को भी भरपूर स्थान दिया गया। ऐसे अखबारी कतरनों की रपट को लोगों ने चाव से पढ़ा व एलबम के रूप में प्रदर्शित करने वाले छात्रों को पुरस्कृत किया गया।
प्रदर्शनी के दूसरे व समापन दिवस समारोह को संबोधित करते हुये प्रिंसिपल जेआर मिश्र ने बच्चों द्वारा स्वहस्तनिर्मित कलाकृतियों की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदर्शनी ही छात्रों के मानसिक विकास व शिक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण है। उक्त अवसर पर प्रबंधक केके मिश्र, सिटी ब्रांच इंचार्ज शीला मिश्रा, डब्लू जी, पॉल टाइटस, डीएन तिवारी, सुरेश कुमार गुप्ता आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। प्रदर्शनी को सफल बनाने में पीयूष त्रिपाठी, नीलम वर्मा, डीबी मिश्र, संजीत कुमार आर्य, अजय कुमार उपाध्याय, किरण शुक्ला, एसएन खरे, प्रमोद कुमार, रंजीत सिंह, राजेश कुमार पाण्डेय, बाल मुकुंद पाठक, अरूण कुमार पाण्डेय, संजीत कुमार, नुजहत जहां, नाजीश, मदन यादव, शिप्रा त्रिपाठी, शिल्पी साहू, शिल्पी जान, च्योति मिश्रा आदि का सराहनीय योगदान रहा।
Monday, September 5, 2011
कुल 91 लाभार्थियों को दिए सिलाई मशीन व कम्प्यूटर कीट्स !

नगरीय क्षेत्र के बीपीएल व शिक्षित बेरोजगार युवकों को सिलाई व कम्प्यूटर से नि:शुल्क प्रशिक्षित कर रोजगार दिलाने के उद्देश्य से वर्ष 2009-10 के सिलाई व कम्प्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले क्रमश: 40 व 51 लाभार्थियों को शहर के जगदीशपुर स्थित पानी टंकी परिसर में आयोजित वितरण शिविर में 40 उषा सिलाई मशीन व 51 कम्प्यूटर किट्स का वितरण अपर जिलाधिकारी रामसजीवन व अध्यक्ष नगर पालिका परिषद बलिया संजय उपाध्याय द्वारा किया गया। एडीएम ने प्रशिक्षार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि गरीब व छोटे तबके के लोगों को रोजगार मुहैया कराने के उद्देश्य से विभिन्न ट्रेडों में आईटीआई के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाता है। डूडा के पीओ एडीएस चौहान ने कहा कि जनपद के सभी नगरीय क्षेत्र के बीपीएल श्रेणी के 18 से 35 आयु वर्ग के शिक्षित बेरोजगार युवा/युवतियां मोटर ड्राइविंग, कम्प्यूटर, मोबाइल रिपेयरिंग, सुरक्षा गार्ड आदि में नि:शुल्क प्रशिक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार की उपलब्धता को दृष्टिगत रखते हुए प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु संबंधित निकाय के अधिशासी अधिकारियों एवं जनपद स्तर पर डूडा कार्यालय से सम्पर्क पर पंजीकरण करा सकते हैं।
शिविर में नपा के ईओ बीपी सिंह, आईटीआई बलिया के प्रधानाचार्य आरपी यादव, सीडीएस अध्यक्ष श्रीमती माया देवी व कुमारी हीरा सहित अन्य कर्मचारीगण व लाभार्थी उपस्थित रहे।
Thursday, September 1, 2011
!!!!! मैं ही मैं हूं !!!!!

मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं.. मेरी मर्जी..
क्यों भई? ऐसा कैसे चलेगा? ये हक आपको किसने दे दिया कि आप चाहे जो करें, सब चलेगा? क्या आप परमपिता परमेश्वर हो गए हैं कि सब आप ही का चलेगा? दुनिया में दूसरे किसी को कोई हक नहीं रह गया है? क्या सबके जीवन के सारे अधिकार सिर्फ आपकी मुट्ठी में सिमट कर रह गए हैं?
जी हां, क्योंकि..
इस जमीं से आसमां तक
मैं ही मैं हूं..
वजह टकराव की
आम राय मानें तो यही आज की दुनिया की सोच बनती जा रही है। जाहिर है, इसमें मैं भी शामिल हूं, आप भी शामिल हैं, ये भी शामिल हैं, वो भी शामिल हैं और हमारे आसपास के सभी लोग- स्त्री-पुरुष, बच्चे-बुजुर्ग.. भी शामिल हैं। क्या पता कुछ लोग इस सोच से मुक्त ही हों, लेकिन इससे क्या होता है? करीब सात अरब की आबादी में एक-आधा अरब लोग सही सोच रखते हों और बाकी दुनिया को उससे प्रभावित न कर सकें तो फर्क ही क्या पडता है? गलत सोच के बहुमत से आजिज आकर सही सोच का अल्पमत अकसर उनके पाले में जा खडा होता है। ऐसा इतिहास में कई बार देखा जा चुका है। हम शायद फिर इसी दिशा में बढ रहे हैं।
हालांकि उस तरफ बढना कोई नई बात नहीं है। सच तो यह है कि इस सोच की मौजूदगी दुनिया के हर समाज में हमेशा रही है। एक छोटे से घर के भीतर होने वाले विवादों से लेकर कई महायुद्ध तक इसके प्रमाण हैं। लेकिन बहुत लोग ऐसा मानते हैं कि पहले इस सोच से ग्रस्त लोगों की संख्या कम थी, जो अब बहुत बढ गई है और बढती ही जा रही है। जब उनकी तादाद कम थी तो यह सोच बहुत लोगों को प्रभावित करने की हैसियत में नहीं थी, लेकिन अब जब आबादी में ऐसे लोगों का अनुपात बढता ही जा रहा है तो? अब वे बाकी आबादी को दबाने की हैसियत में आ गए हैं और दबा रहे हैं। बेशक, वे कभी एकजुट नहीं हो सकेंगे। क्योंकि अहंकार और स्वार्थो की अंधी दौड सिर्फ लडाती है, बांधती नहीं। यह सिर्फ तोडती है, जोडती नहीं। लेकिन दुनिया की ज्यादातर आबादी अगर आपस में टकराव की शिकार हो, तो जो उसमें शामिल न हों यानी शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहें, वे भी शांति से कैसे जी सकेंगे?
मैं की खोह
यह एक त्रासद सच है कि इस सोच के साथ-साथ इसका असर भी व्यापक होता जा रहा है और उसे साफ-साफ देखा भी जा रहा है। परिवारों के टूटने से लेकर सामाजिक विघटन और कई राष्ट्रों में गृहयुद्ध तक..। टूटने का यह सिलसिला अंतहीन है। आम जनजीवन में देखें तो छोटी-छोटी बातों पर लडाई, रोडरेज, संयुक्त परिवार की तो बात ही छोडिए, एकल परिवारों में दांपत्य संबंधों तक का टूटना, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, छोटी-छोटी बातों के लिए निहायत निम्न कोटि की चालाकियां.. क्या है यह सब? ऐसा लगता है, गोया किसी का किसी से कोई मतलब नहीं रह गया है। हर शख्स अपने-आपमें ही गुम है और मैं मेरे की उस खोह से बाहर आने की इच्छाशक्ति तक खो चुका है।
सोच का फर्क
लेकिन नहीं, इसे अपनी स्थायी सोच बनाने के पहले जरा ठहरिए। अपने आसपास जरा नजर दौडाइए, तमाम दुराग्रहों से मुक्त होकर। आप पाएंगे.. कहीं कोई दुर्घटना घट गई और इर्द-गिर्द मौजूद हर शख्स अपने स्तर से हर संभव मदद के लिए तैयार खडा होता है। देश ही नहीं, दुनिया के किसी कोने में कोई प्राकृतिक आपदा आ गई और जिससे जो संभव है, वह वही लेकर मदद के लिए हाजिर है। और तो और, व्यवस्था में व्याप्त खामियों के खिलाफ आवाज उठाने की बात हो, तो भी देख लें। उन्हें नेतृत्व की नीयत पर भरोसा होना चाहिए, फिर देखिए, क्या नहीं कर गुजरते हैं लोग। अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में बेतरह व्यस्त आज का युवा, जो अपने स्वास्थ्य जैसी अनमोल चीज के लिए जरूरी लाइफस्टाइल तक की परवाह नहीं करता, वही ऑफिस से छुट्टी करके जन लोकपाल के लिए अन्ना के धरने में शामिल होता है और उनके लए जनमत सर्वेक्षण तक करता है। बिना किसी पारिश्रमिक और बिना किसी लालच के। वह यह काम सिर्फ कॉमन गुड के लिए करता है। ऐसा क्यों होता है कि तारे जमीं पर, पीपली लाइव, रंग दे बसंती, 3 इडियट्स, लगे रहो मुन्नाभाई, ब्लैक फ्राइडे, अ वेडनेसडे, राजनीति या गंगाजल जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड तोड देती हैं?
सोशल नेटवर्किग साइट ट्विटर पर अभिव्यक्तियों के संदर्भ में अमेरिका की ओरल रॉबर्ट यूनिवर्सिटी के एक शोध में भी यह बात सामने आई है कि युवाओं की सबसे ज्यादा अभिव्यक्तियां सामाजिक-राजनीतिक परिघटनाओं के संज्ञान और उन पर सहमति या विरोध जताने वाली हैं। क्या मालूम होता है इससे? जाहिर है, अपने समय का समाज सबकी चिंता का विषय है। सभी इसे लेकर सोचते हैं और ईमानदारी से कुछ न कुछ करना भी चाहते हैं। यह अलग बात है कि व्यवसाय के नजरिये से अत्यंत प्रतिस्पर्धा के इस युग में उन्हें च्यादा समय अपने कामकाज को देना पडता है। इस दौरान उपजे तनाव से उबरने के लिए वे बचा हुआ समय रिलैक्सेशन पर खर्च करते हैं। अब यह अलग बात है कि रिलैक्सेशन का सबका अपना तरीका है। कोई इसके लिए ध्यान-योग की मदद लेता है, कोई पढ-लिखकर इससे मुक्त होता है और कोई मनोरंजन के विभिन्न साधनों से। पहले के लोगों की तरह वे आम तौर पर पडोसियों-परिचितों का हाल लेने या इधर-उधर के कार्यक्रमों में शामिल होने में बहुत रुचि नहीं ले पाते।
मूल्यहीनता नहीं है आधुनिकता
हम यह क्यों भूल जाते हैं कि आधुनिकता के दर्शन की शुरुआत ही व्यक्ति को महत्व देने की सोच के साथ हुई है? अब यह अलग बात है कि इस दर्शन में व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसके कर्तव्य और दायित्वों को भी पूरा महत्व दिया गया है। आधुनिकता या व्यक्तिवादी सोच का मतलब मूल्यहीनता या अपने सामाजिक कर्तव्यों-दायित्वों से मुंह मोड लेना बिलकुल नहीं है। अपने मूल रूप में व्यक्तिवादी सोच का आग्रह सिर्फ इतना ही है कि आप जैसे भी हैं, स्वयं को वैसे ही स्वीकार करें। खुद को लेकर कोई हीनता बोध या दुराग्रह न पालें। सिर्फ इसलिए कि समाज आपसे ऐसा चाहता है, कुछ भी न करें, जब तक कि आपका विवेक आपको इसकी इजाजत नहीं देता। यह याद दिलाता है कि अपनी सबसे पहली जिम्मेदारी आप स्वयं हैं। यकीनन यह सिर्फ एक दर्शन नहीं, समय की जरूरत थी। इस दर्शन ने कई मामलों में बडी राहत भी दी। उनकी सोचिए, जो किसी तरह की शारीरिक-मानसिक कमजोरी के कारण स्वयं को ही हेय मान बैठते थे। उन स्त्रियों की सोचिए जो पूरे परिवार का ध्यान रखते खुद को ही भूल जाती थीं। इसके चलते वे तमाम व्याधियों-बीमारियों की शिकार होती थीं। किसी हद तक यह बात आज भी है, लेकिन फिर भी आज की स्त्री ने स्वयं पर ध्यान देना सीखा है। समाज का भय इतना था कि कई बार लोग समाज की अपेक्षाओं पर खरे उतरने के लिए अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा खर्च कर डालते थे। इसके बाद वर्षो कर्ज चुकाते रहते थे। बहुत लोग अब इस सोच से उबर चुके हैं। जो नहीं उबरे हैं, वे उबरने की कोशिश में हैं। आज के युवा वर्ग में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो समाज के भय से कोई काम नहीं करते। वे जो करते हैं, अपने विवेक और अपनी सुविधा के अनुसार करते हैं। वे यह पसंद नहीं करते कि कोई उनकी जिंदगी में दखल दे और खुद भी किसी के मामले में अनावश्यक दखल देने बिलकुल नहीं जाते।
ही नहीं भी
हां, यह तब त्रासद लगता है जब हमारी इसी प्रवृत्ति के चलते कभी-कभी बडी घटनाएं घट जाती हैं और हमें पता भी नहीं चल पाता। कई बार यह लापरवाही हमारे लिए जीवन भर के संताप में बदल जाती है। यह कुछ और नहीं, सिर्फ व्यक्तिवाद की सोच को सही संदर्भ में न समझ पाने का नतीजा है। आधी-अधूरी समझ हमेशा खतरनाक होती है। अभी जो कष्टप्रद हालात हम देख रहे हैं, वे शायद कुछ लोगों की ऐसी ही समझ के नतीजे हैं। ध्यान रहे, यह सोच यह तो कहती है कि मैं महत्वपूर्ण हूं, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं कहती कि सिर्फ मैं ही महत्वपूर्ण हूं। इसका आग्रह सिर्फ इतना ही है कि सबके यानी समाज के चक्कर में खुद को न भूलो। याद रखो कि मैं हूं यानी मैं भी इस दुनिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूं, यह नहीं कि सिर्फ मैं ही हूं। दूसरे लोग भी हैं और उनका होना भी उतना ही अहम है, जितना कि मेरा। यकीनन, ही और भी का यह फर्क अगर हम ठीक से समझ सकें तो न परिवार टूटेंगे, न समाज और न हम खुद। बल्कि दुनिया लगातार बेहतर होती चली जाएगी।
बिना किसी औपचारिकता के भी निभा सकता हूं
अमिताभ बच्चन, अभिनेता
हम ऐसी स्थिति में हैं,जहां चार लोग हमें पहचानते हैं। हमारी बात सुनना चाहते हैं। मैं तो यूनाइटेड नेशंस के यूनिसेफ का एंबेसेडर हूं। हाल ही में मुझे नई जिम्मेदारी दी गई है। यूनिसेफ वालों ने मुझे गर्ल चाइल्ड वेलफेयर के लिए एंबेसेडर निर्धारित किया है। जब यूनिसेफ वालों की तरफ से मेरे पास यह प्रस्ताव आया, तो मैंने उनसे कहा कि हमें एंबेसेडर बनाने की क्या जरूरत है? मैं इस जिम्मेदारी को बिना किसी औपचारिकता के भी निभा सकता हूं।
जिम्मेदार हैं युवा
सोनाक्षी सिन्हा, अभिनेत्री
समाज के प्रति जिम्मेदार हैं आज के युवा। मैं ख्ाुद भी एक जिम्मेदार युवा हूं। समय के हिसाब से हम आगे बढ रहे हैं। अगर अपने लिए हम कुछ कर रहे हैं तो उसमें बुरा क्या है? लेकिन दिन भर के बाद अगर थोडा भी वक्त समाज के लिए निकाल लें तो यह अच्छी बात होगी। अपनी जेब भरने के बाद अगर दूसरे की जेब में कुछ पैसा डाल देंगे तो उससे आत्मसुख मिलेगा। आज हम अपने बारे में भी सोचते हैं और समाज के लिए भी। बस कंसेप्ट में थोडा बदलाव जरूर आया है पहले हम अपने बारे में सोचते हैं। फिर दूसरे के लिए। लेकिन सोचते जरूर हैं। वर्चुअल वर्ल्ड सबके लिए खुला है। अगर हम उस स्तर पर कोई बदलाव लाते हैं तो इससे अच्छा और क्या है। जहां तक मेरा सवाल है मुझे जब भी मौका मिलता है मैं समाज के लिए कुछ न कुछ जरूर करती हूं। जितना समय मिलता है मैं लोगों की मदद करती हूं। चाहे वह किसी भी तरह से क्यों न हो। अगर मुझे कोई समाजसेवी संस्था कहीं बुलाती है तो मैं चली जाती हूं। इससे चैरिटी को बढावा मिलता है। इसमें बुराई क्या है? मैं फिल्मों में काम कर रही हूं इसलिए बहुत ज्यादा कुछ तो नहीं कर सकती, लेकिन अगर किसी संस्था की तरफ से मुझे बुलाया जाता है तो मैं पूरी कोशिश करती हूं उसमें शामिल होने की। फिल्म इंडस्ट्री यूं भी इन सब मामलों में काफी आगे है।
फिल्मों के जरिये निभाता हूं
आमिर खान, अभिनेता
जहां तक सोशल रेस्पांसिबिलिटी का सवाल है, मेरे हिसाब से हर इंसान को अपने समाज के प्रति जिम्मेदार होना ही चाहिए। आप चाहे एक्टर हों या डॉक्टर हो, चाहे बिजनेसमैन हों या जर्नलिस्ट हों, ड्राइवर हों, दुकानदार हों, फिल्ममेकर हों, या फिर कथाकार..देश के हर इंसान को अपने समाज की बेहतरी के लिए योगदान करना चाहिए। जरूरी नहीं कि आप कुछ बडा करें। जितना आपके हाथ में है, उतना जरूर करिए। मैं एक एक्टर के तौर पर जितना कर सकता हूं, जरूर करता हूं। लोग कहते हैं कि आप पॉलिटिक्स में घुसने वाले हैं क्या? मैं उनसे कहता हूं कि जरूरी नहीं है कि पॉलिटिशियन बनकर ही ऐसे काम किए जा सकते हैं। मैं अपनी फिल्मों से वह काम करता हूं। अपनी फिल्मों के जरिये अपने सोशल कंसर्न लोगों तक पहुंचाता हूं।
बखूबी समझता हूं जिम्मेदारी
संजय दत्त, अभिनेता
मैं अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को बखूबी समझता हूं। हमारा परिवार हमेशा अपने सामाजिक दायित्व को निभाने में आगे रहा है। दत्त साहब द्वारा स्थापित नरगिस दत्त मेमोरियल फाउंडेशन के जरिये हम कैंसर पीडित मरीजों की मदद करते हैं। साथ ही, मैं स्वयंसेवी संस्था सपोर्ट से भी जुडा हुआ हूं, जो सडक पर अपना जीवन बसर करने वाले बच्चों को नशे से दूर रखने में मदद करती है। मैं नहीं चाहता कि जिन हालात से मैं गुजर चुका हूं उससे कोई दूसरा बच्चा गुजरे।
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संस्कारों की अहमियत समझें
शिखा स्वरूप, अभिनेत्री
मैं ऐसे संस्कारों के साथ पली-बढी हूं कि व्यक्तिवाद की सोच से भी दूर रहती हूं। हम जिस फील्ड में हैं वहां भी सेंसर बोर्ड है। उसे देखना होता है कि क्या गलत है और क्या सही। इसी तरह घर में भी मां-बाप सेंसर बोर्ड का काम करते हैं। उन्हें अपने बच्चों पर ध्यान देना होगा कि वे कुछ ऐसा न करें। यहां अहम बात यह भी है कि जब हम ही सही नहीं होंगे, तो बच्चों को क्या कहेंगे? मैं आजाद खयाल होने को बुरा नहीं मानती, लेकिन आजादी की भी सीमा होती है। हद से बाहर जाना आजादी नहीं, मनमानी है। आज बच्चे जब कॉलेज में जाते हैं या वे 17 साल के होने के बाद जब घर से बाहर दोस्तों के साथ होते हैं तो उनकी सोच क्या होती है, यह बात किसी छिपी नहीं है। हर जगह ऐसा देखने को मिलता है कि जब जो चाहें लोग कर रहे हैं, बच्चे जो मन में आया बोल रहे हैं। समाज कैसा और कैसे बुजुर्ग? मेरी समझ से यहां आपके संस्कार का उनमें होना ही काम आएगा।
मैं दिखावे से हमेशा दूर रहती हूं और लोगों से भी यही बात कहती हूं कि वे बेवजह दिखावे से खुद को दूर रखें। एकल परिवार पश्चिम की सोच है और चूंकि हमारे यहां यह अब गहरी जडें जमा रहा है, तो उसका खमियाजा भी भुगत रहे हैं बहुत लोग। मान-मर्यादा जैसी बातें तो कम ही देखने को मिलती हैं। जिसे देखो वही पैसे के पीछे दौड रहा है। पता नहीं लोगों को कितने पैसों की जरूरत है। उन्हें और कितना चाहिए यह भी सीमा नहीं है। जो मिल जाए वह भी कम है। हम समाज के साथ जीते हैं। मैं तो छोटी-छोटी बातों को लेकर हर किसी से कहती हूं कि जब हम अपने घर को और मन को साफ नहीं रख सकेंगे तो भला देश को क्या साफ कर पाएंगे?
रतन
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गायब हो गए आदर्श
नलिनी, नृत्यांगना
संबंध समाज की बहुत बडी देन हैं और ये दूसरों को महत्व देने से ही बनते हैं। जिस व्यक्ति की सोच के केंद्र में सिर्फ वही होगा, उसके लिए संबंधों का निर्वाह कर पाना कभी संभव नहीं होगा। हमारे समाज की यह सोच नहीं रही है। सामाजिक व्यवस्था की हमारी सोच दुनिया में शायद सबसे पुरानी है। इसे संगठित करके इस तरह बनाया गया है कि मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी और पेड-पौधे तक आपस में एक-दूसरे से जुडे रहें। सबके अधिकार थे तो सबकी जिम्मेदारियां भी तय थीं और सभी उन्हें निभाते भी थे। स्त्री-पुरुष अपनी जिम्मेदारियां निभाते हुए एक-दूसरे के योगदान का सम्मान करते थे। पति अगर आर्थिक आय के लिए घर से बाहर होता था तो पत्नी घर के भीतर की जिम्मेदारियां निभाती थी। आज दोनों कमाने में लगे हैं, लेकिन जिस सुख के लिए सारी परेशानियां मोल ले रहे हैं, वही जीवन से गायब है।
संगीत-नृत्य की दुनिया में भी यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। पहले कलाकार कला के उद्देश्य को महत्व देते थे। वे जानते थे कि कला की दुनिया में लोग तनाव से मुक्ति पाने के लिए आते हैं। वे उसी अनुसार अपनी प्रस्तुतियां करते थे। शास्त्रीय संगीत की राग-रागिनियों और नृत्य विधाओं में इसका खयाल रखा जाता था। अब कई कलाकारों के लिए श्रोता-दर्शक और उसके जीवन की सुख-शांति महत्वपूर्ण नहीं रह गई है। उन्हें अपने व्यक्तित्व का विस्तार सबसे जरूरी लगने लगा है। इसके लिए वे चमत्कार के पीछे पडे रहते हैं। इससे कलाकार भले बडे बन जाएं, लेकिन श्रोता या दर्शक तो सिर्फ तनाव पा रहे हैं। बच्चों या युवाओं में बडों के प्रति सम्मान का भाव नहीं दिख रहा है। नतीजा यह हुआ है कि समाज से मूल्य गायब हो रहे हैं। आदर्श जीवन के किसी क्षेत्र में दिख ही नहीं रहे हैं और यह इसका सबसे बडा दुष्परिणाम है।
व्यक्तिगत सक्रियता जरूरी
कोयना मित्रा
समाज से जुडी चिंता को दिखाने के लिए यह काफी नहीं है कि आप सोशल आर्गेनाइजेशन को कुछ पैसे डोनेट कर अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं। सलेब्रिटी चाहें तो काफी कुछ कर सकते हैं। हमारी पर्सनैलिटी और हमारा चेहरा सामाजिक समस्याओं से जूझने में मददगार हो सकता है। लोग हमारी बात सुनते हैं और उसे फॉलो करने की कोशिश करते हैं। जब भी मौका मिलता है मैं व्यक्तिगत तौर पर सामाजिक मुद्दों से जुडे कार्यक्रमों में हिस्सा लेती हूं और अपनी बात रखती हूं। मेरी मौजूदगी से यदि आम लोगों का ध्यान किसी सामाजिक समस्या की तरफ जाता है तो मैं हमेशा तैयार रहती हूं।
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मुश्किल से मिलता है समय
विनय पाठक, अभिनेता
मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि लोगों का समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव गायब हो गया है। दरअसल, अब लाइफस्टाइल ऐसी हो गई है कि अपने घर-परिवार तक के लिए बमुश्किल समय मिलता है। मैं अपनी ही बात करूं तो शूटिंग के बाद जो कुछ भी समय मिल पाता है, मैं आराम करना चाहता हूं। अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहता हूं। उसके बाद समाज के लिए कुछ करने का समय कम ही मिलता है। कई बार मैंने चैरिटी शोज किए हैं। ऐसा कहीं भी पता चलता है तो मैं अपने योगदान के लिए तुरंत तैयार हो जाता हूं। आज हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर सब कुछ डाल देता है। मैं अकेले कैसे करूं की दुहाई देने लगता है। लेकिन अगर हर कोई समाज के लिए निजी स्तर पर न सोचे किसी दूसरे को जिम्मेदार ठहराए तो कुछ नहीं होने वाला। इसे पल्ला झाडना ही कहा जा सकता है। लोगों की सोच बदल चुकी है। समाज के डर से स्त्रियां जीवनभर पति और ससुराल वालों का जुल्म नहीं सह रही है। उसके खिलाफ आवाज उठा रही हैं। यह अच्छी बात है। पर अगर समाज का जरा भी डर नहीं रहेगा तो दिनदहाडे दुष्कर्म, कत्ल, चोरी, छेडखानी जैसी घटनाएं भी बढ जाएंगी। कुछ नियम और डर निहायत जरूरी होते हैं। बदलाव कोई भी हो, उसके पहलू हमेशा दो होते हैं। लोग अपने तक सीमित हो गए हैं तो यह इस लिहाज से अच्छा है कि अब वे अपने बारे में सोचने लगे हैं।
मैं ख्ाुद को एक जिम्मेदार नागरिक मानता हूं। हम चैरिटी के लिए काम करते हैं। चाहे वह कन्या भ्रूण सुरक्षा के लिए हो या साक्षरता के लिए। मैं घर-घर जाकर भी जागरूकता कार्यक्रम चला चुका हूं।
इला श्रीवास्तव
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अध्यात्म ही बचा सकता है समाज को
आशुतोष जी महाराज
आज स्वार्थ के बढते दायरों के समक्ष समाज गौण हो गया है। दूसरे शब्दों में यह अधिकारों एवं कर्तव्यों के बीच की लडाई है। व्यक्तिवादी सोच ने अधिकारों की मांग को प्रबलता दी है और कर्तव्यों का निर्वाह क्षीण हो गया है। इस समस्या का निदान भारतीय संस्कृति के मूल चिंतन अध्यात्म में निहित है क्योंकि यह अधिकार एवं कर्तव्य के बीच संतुलन का मार्ग है। समाज की दशा व्यक्तियों की सोच की दिशा पर निर्भर है और सामाजिक कुरीतियां सोच में स्वार्थ की अति से उत्पन्न रुग्णता का ही नतीजा हैं। इन्हें मिटाने के लिए विवेक बुद्धि की आवश्यकता है। जो देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप शुभ चयन की प्रक्त्रिया है। यह लोग क्या कहेंगे नजरिये को क्या सही है वही करेंगे में रूपांतरित करने का बल देती है।
स्वार्थजनित सोच से संयुक्त परिवार नष्ट हो रहे हैं और इससे असुरक्षा बढ रही है। संबंधों में आत्मीयता के लिए आवश्यक है प्रत्येक व्यक्ति में अध्यात्म के बीज बोने की। व्यक्तिवादी सोच विश्लेषण की प्रक्रिया है तो अध्यात्मवादी सोच संश्लेषण की। विश्लेषण में खंड-खंड टूटना है, तो संश्लेषण में खण्ड-खण्ड का एकीकरण है। स्वार्थ और अहंकार व्यक्ति से राष्ट्र तक सबको लील रहे हैं। परिणाम स्वरूप सामने है- भ्रष्टाचार, हिंसा, आंतकवाद, गरीबी, दूषित पर्यावरण और अपने अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाए युद्ध की विभीषिका में जलता विश्व। इस अग्नि का शमन केवल ब्रह्मज्ञान की शीतल फुहारों से ही संभव है। अध्यात्म से उत्पन्न सर्वे भवंतु सुखिन: की पवित्र भावना ही सबकी उन्नति में अपनी उन्नति देखने की दृष्टि दे सकती है।
बैलेंस बनाकर चलें
टॉम आल्टर, चरित्र अभिनेता
आजादखयाली अच्छी है, पर बुरी भी। जब हम बदलाव की स्थिति से गुजरते हैं, तो यह भी ध्यान रखना होता है कि हमें कितना बदलना है। लेकिन इसका होश न हमें है और न ही हमारी नई पीढी को। हमें ध्यान रखना होगा कि हम कितने साफ हैं। यदि हम साफ हैं तो दुनिया अपने आप साफ हो जाएगी और समाज भी स्वस्थ हो जाएगा। इसके मूल में अहम बात यह भी है कि संस्कार हम उन्हें कैसा दे रहे हैं और हम खुद कितने संस्कारी हैं। आजाद खयाल होना जितनी अच्छी बात है उतनी ही गलत भी। हमें बैलेंस बनाकर चलना चाहिए।
फिजूल के दिखावे और खर्च करने की बात जहां तक है, तो इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है। इस बारे में कम शब्दों में बोलना सही नहीं होगा। वैसे इससे बचना चाहिए। मैं आजाद खयाली को लेकर ज्यादा मायूस नहीं हूं, लेकिन इतना भी न हो कि हम हदें पार कर जाएं और कुछ गलत हो जाए। मैं यह कई संदर्भो को भी देख रहा हूं। हमारे यहां करप्शन भी है और पूजा भी हम ही करते हैं। यहां सब कुछ है, लेकिन बदलाव उतना ही अच्छा जितना दाल में नमक। मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम कभी एक होते हैं और कभी अलग भी।
मैं तो हर उस काम से आहत होता हूं, जो मुझे गलत लगता है। खुशी भी होती है कभी। ये सभी काम हम सभी करते हैं। रही बात समाज के प्रति जिम्मेदारी की तो मेरा सीधा मानना है कि हम सभी समाज में ही जीते हैं, जहां जाते हैं वहां क्षण में एक समाज बन जाता है। हम समाज के बिना कैसे जी सकते हैं?
समाज व देश के बारे में सोचना जरूरी
माधुरी दीक्षित
सामाजिक जिम्मेदारी को महसूस करना वक्त की मांग है। हमें खुद से ऊपर समाज और देश के बारे में सोचने की जरूरत है। जरूरी नहीं है कि हम कुछ बडा करें। छोटी-छोटी बातों से आप समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सकते हैं। मैं ऐसा करती हूं। अपने आस-पास के लोगों की खुशियों का खयाल रखें। अगर आपके आसपास कुछ बुरा हो रहा है तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी खुद पर लें। सामाजिक रूप से जागरूक होने का मतलब है कि आप अपना नेता ख्ाुद चुनें, वोट करें। जहां रहें, उस जगह को साफ और अपराधमुक्त रखने में मदद करें। पर्यावरण पर ध्यान दें। इलेक्ट्रीसिटी सेव करें। हमेशा सही का साथ दें। मैं यूएस में रहूं या इंडिया में.. अपनी जिम्मेदारियों को नहीं भूलती हूं। अपनी क्षमता के अनुसार बेहतर समाज और देश के निर्माण में अपना योगदान करती हूं।
टाइम पास के लिए सही नहीं
राहुल बोस
मेरी व्यक्तिगत राय है कि एक सलेब्रिटीज को अपने सोशल कंसर्न से जुडे होना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके मोहल्ले, शहर और देश में क्या हो रहा है? और क्यों हो रहा है? उन्हें अपने मौलिक अधिकार और कर्त्तव्य की जानकारी होनी चाहिए। हालांकि वे सोशल एक्टिविटी में हिस्सा लेते हैं या नहीं, यह पूरी तह उनकी सोच पर निर्भर करता है। ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लेते समय उन्हें एंजॉय करना चाहिए। अगर वे टाइम पास के लिए सोशल एक्टिविटी का हिस्सा बनते हैं तो यह कहीं से भी सही नहीं है। ऐसे लोगों के लिए बेहतर है कि वे सामाजिक जिम्मेदारी का नाम करने के बजाय ग्लैमर की दुनिया में ही व्यस्त रहें।
Sunday, August 28, 2011
कर्मो से ही होती है व्यक्ति की पहचान !

Monday, August 22, 2011
रो पड़ा फलक, फटा धरती का कलेजा !

किसी ने सोचा भी नहीं था कि सोमवार की सुबह, मौत का खेल खेलेगी लेकिन हुआ यही और ट्रैक्टर ट्राली हादसे के रूप में बागी धरती को तीसरी बड़ी त्रासदी झेलनी पड़ी। खास बात यह रही कि रूह को कंपा देने वाली अब तक की तीनों ही घटनाएं सोमवार के दिन ही हुई। नगरा थानांतर्गत निछुआडीह, गौवापार गांव के समीप सोमवार पूर्वाह्न करीब दस बजे पानी से भरे गढ्डें में ट्रैक्टर ट्राली के पलट जाने से उस पर सवार लोगों में से 41 की मौके पर हुई मौत ने एक बार फिर जनपदवासियों को झकझोर कर रख दिया और आंखों में कौंध गया 17 अक्टूबर 2005 व 14 जून 2010 के वे खौफनाक मंजर। मौत के ताण्डव को देख कर धरती का कलेजा फटा जा रहा था वहीं फलक भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाया और दिन ढलते ही आसमानी बूंदे टपक पड़ीं।
बता दें कि हल्दी थाना क्षेत्र के ओझवलिया घाट पर 14 जून 2010 दिन सोमवार को गंगा में हुई नाव दुर्घटना में 62 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। हादसे का सबब बनी थी जर्जर नाव जिस पर क्षमता से कहीं अधिक लोग सवार थे। आलम ये था कि नदी से शव बाहर निकाले जा रहे थे तो दूसरी तरफ बगल में ही मृतकों की चिताएं भी जल रही थीं। मौत ने इसके पहले भी खेल गंगा की लहरों में ही 17 अक्टूबर 2005 को खेला था जब फेफना थाना क्षेत्र के छप्पन के डेरा गांव में मजदूरों से भरी नाव पलट गयी थी। इस नाव पर सवार होकर परवल की रोपाई करने जा रहे 46 मजदूर काल के गाल में समा गये थे। उस समय भी हर तरफ फैली लाशें और उसके आस पास विलाप करते परिजनों को देख उस दियारे का भी कलेजा फट गया था। ओझवलिया में जहां घटना के बाद लोग काफी देर तक प्रशासन का मुंह ताकतें रहे वहीं छप्पन के डेरा की घटना में तत्कालीन राजस्व मंत्री और क्षेत्र के विधायक अम्बिका चौधरी के प्रयास से वहां राहत कार्य बहुत तेजी से हुआ। घटनास्थल पर ही मृतकों के शव का पोस्टमार्टम हुआ और मृतकों के परिजनों को शवदाह से पूर्व ही एक-एक लाख रुपये की अहेतुक सहायता प्रदान कर दी गयी थी। ट्रैक्टर ट्राली हादसे में भी मृतकों के शवों के पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय भेजना प्रशासन ने मुनासिब नहीं समझा और नगरा में ही इसकी व्यवस्था कर दी गयी।
Sunday, August 21, 2011
युवा और देश का इतिहास !

आधुनिक विचारों के धनी भारतीय युवा
युवा किसी भी देश के विकास में महत्वपूर्ण होते हैं, उन्हें अच्छे बनने की प्रेरणा इतिहास से मिलती है। भारत को युवाओं का देश कहा जा सकता है और देश की तरक्की में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। आज ही नहीं, आजादी से पहले ही युवा देश के विकास और आजादी में काफी आगे रहे हैं। देश के पूरे स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं का जोश व मजबूत इरादा हर जगह नजर आया है। चाहें वह महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंहिसात्मक आंदोलन या फिर ताकत के बल पर अंग्रेजों को निकाल बाहर करने का इरादा लिए युवा क्रांतिकारी, सभी के लिए इस दौरान देश की आजादी के सिवाय बाकी सभी चीजें गौण हो गई थीं। स्कूल, कॉलेज राष्ट्रीय गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन रहे थे। इस दौरान शिक्षा का मतलब ही राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली बन गया था। जिसके अंतर्गत अंग्रेजी स्कूलों मिशनरी शिक्षा संस्थानों का बहिष्कार किया गया।
भगत सिंह
23 साल की उम्र बहुत नहीं होती। उम्र के जिस पडाव पर आज के युवा भविष्य, कॅरियर की उधेडबुन में रहते हैं भगत सिंह ने उसी उम्र में अपना जीवन ही राष्ट्र के नाम कर दिया था। दुनिया उन्हें फिलोशफर रिवोल्यूशनर के नाम से जानती है , जो गोली बदूंक की धमक से ज्यादा विचारों की ताकत पर यकीन रखते थे। डीएवी कॉलेज, लाहौर से शिक्षित भगत सिंह अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी, उर्दू पर बराबर अधिकार रखते थे। लेकिन ऐसे प्रतिभावान युवा के लिए जीवन की सुखद राहें इंतजार ही करती रह गई, क्योंकि उनका रास्ता तो कहीं और से जाना तय लिखा था- जी हां, बलिदान की राह का पथिक बन भगत सिंह ने अपना नाम सदा सदा के लिए इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया और इतने वषरें के बाद भी आज हर युवाओं के धडकन में समाए हुए हैं।
चंद्रशेखर आजाद
छोटी सी उम्र लेकिन हौसले इतने बुलंद कि दुनिया की सबसे ताकतवर सत्ता भी उसके आगे बेबस नजर आई। केवल पंद्रह साल की उम्र में जेल गए, अंग्रेजों के कोडे खाए। फिर तो इस राह पर उनका सफर, शहादत के साथ ही खत्म हुआ। हम बात कर रहे हैं अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की। मां की इच्छा थी कि उनका चंदू, काशी विद्या पीठ से संस्क ृत पढे। जिसके लिए उन्होंने वहां प्रवेश भी लिया, लेकिन नियति ने तो उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।
सुभाष चंद्र बोस
समृद्ध परिवार, असाधारण मेधा , बेहतर शक्षिक माहौल। कहने के लिए तो एक शानदार कॅरियर बनाने की वो सारी चीजें उनके पास मौजूद थी, जिनकी दरकार छात्रों को होती है। लेकिन सुभाष ने वो चुना जिसकी जरूरत भारत को सर्वाधिक थी। आजादी की। 1918 में सुभाष चंद्र बोस ने स्कॉटिश चर्च कॉलेज (कलकत्ता यूनिवर्सिटी) ने स्नातक किया। उसके बाद आईसीएस की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। वो चाहते तो एक सुविधाजनक, एशोआराम का जीवन उनके कदमों पर होता। लेकिन इसे ठुकराकर उन्होंने देश की स्वतंत्रता का संघर्षमय मार्ग चुना। पूरी दुनिया की खाक छानी, फंड जुटाया, आईएनए का गठन किया और ब्रिटिश शासन की जडें हिला दीं।
स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद के पास 1884 में वेस्टर्न फिलॉसपी में बीए करने के बाद विकल्पों की कमी नहीं थी, लेकिन उनका संकल्प तो राष्ट्र सेवा था। उन्होने निराशा में गोते लगा रहे युवा वर्ग को उस समय उठो जागो लक्ष्य तक पहुंचे बिना रूको मत का मंत्र दिया तो वहीं भारत की गरिमा दोबारा स्थापित की। भारत में उनका जन्म दिवस 12 जनवरी युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। अरविंद घोष, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे बहुत से लोगों को इस सूची में स्थान दिया जा सकता है।
Monday, August 8, 2011
रेशम की डोर से बंधा नेह भरा नाता !

मिला बहनों का भरपूर प्यार
राजीव वर्मा, अभिनेता
अगर दिल में एक-दूसरे के लिए नि:स्वार्थ प्रेम हो तो यह बात कोई मायने नहीं रखती कि कोई आपका सगा भाई/बहन है या नहीं? वैसे मेरी दो सगी बहनें हैं, जिनके साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं। इसके अलावा मेरी कुछ मुंहबोली बहनें भी हैं। फोन या ई-मेल के जरिये उनके साथ मेरा संपर्क आज भी बना हुआ है। किसी भी रिश्ते में सहजता और प्यार होना चाहिए। सिर्फ रस्म अदायगी से बात नहीं बनती। मेरी बहनें अगर किसी वजह से मुझे राखी नहीं भेज पातीं और उस दिन केवल मुझसे फोन पर बात कर लेती हैं तो वह भी मेरे लिए काफी होता है।
वक्त के साथ मजबूत हुआ रिश्ता
गुन कंसारा, टीवी कलाकार
मेरा कोई सगा भाई नहीं है, लेकिन अपने चाचा के बेटे तुषार को मैं बचपन से राखी बांधती आ रही हूं। वह मेरे लिए सगे भाई से भी बढकर है। मैं उस पर अपना पूरा हक समझती हूं और रक्षाबंधन वाले दिन मैं उससे अपनी पसंद का गिफ्ट लडकर भी मांग लेती थी। अब करियर के लिए मैं अपना होम टाउन चंडीगढ छोडकर मुंबई आ गई और पहले की तरह हमारा मिलना-जुलना नहीं हो पाता। फिर भी मैं उसके लिए राखी जरूर भेजती हूं और वह भी मेरे लिए गिफ्ट भेजना नहीं भूलता। मुझे ऐसा लगता है कि अगर भाई-बहन के बीच सहज संबंध हो तो दूर रहने के बावजूद वक्त के साथ उनके रिश्ते में और भी मजबूती आ जाती है।
खूबसूरती से संजोया है रिश्ते को
मालिनी अवस्थी, गायिका
वैसे तो मेरे सगे भाई मुझसे बडे हैं और बचपन से आज तक मुझे उनका भरपूर स्नेह मिलता रहा है, लेकिन शादी के बाद राखी और भइया दूज जैसे त्योहारों पर मन में एक कसक सी रह जाती थी कि काश! आज भइया मेरे साथ होते। आज से लगभग 14 वर्ष पहले जब मेरे पति की पोस्टिंग फैजाबाद जिले में थी, तब कुछ ऐसा संयोग हुआ कि वहां संगीत और साहित्य में रुचि रखने वाले, अयोध्या के विमलेंद्र प्रताप मोहन मिश्र से मेरी मुलाकत हुई। पहली ही नजर में वह मुझे बडे अपने से लगे। अनायास ही उनके लिए मेरे मुंह से भइया संबोधन निकल गया। उसी दिन से वह मेरे राखी भाई बन गए। आज भले ही मैं दिल्ली आ गई हूं, लेकिन हमारा यह प्यार भरा नाता आज भी बरकरार है। हम दोनों ने इस रिश्ते को बडी खूबसूरती से संजोकर रखा है।
संभाल कर रखता हूं राखियां
जतिन कोचर, फैशन डिजाइनर
हमारे परिवार में लडकियां बहुत कम हैं, पर मेरी बुआ की बेटी कनुप्रिया मेरी सबसे लाडली बहन है। हमउम्र होने की वजह से हमारा रिश्ता बेहद दोस्ताना रहा है। इस रिश्ते का प्यार आज भी वैसे ही बरकरार है, जैसा कि पहले था। अब उसकी शादी हो चुकी है और वह सिंगापुर में रहती है। दो साल पहले मैं सपरिवार वहां छुट्टियां बिताने गया था। वह मेरे बच्चों की सबसे प्यारी बुआ है। वह हर साल मेरे लिए कोरियर से राखी की थाली भेजना नहीं भूलती। भले ही मैं गिफ्ट देने में देर कर दूं, पर उसकी राखी हमेशा समय से पहले पहुंच जाती है। मेरी सारी कजन्स मुझसे छोटी हैं। एक छोटी बहन हर साल मेरे लिए अपने हाथों से राखी बनाकर लाती है। मैं अपनी सारी राखियां संभाल कर रखता हूं। आजकल राखियां डोरीनुमा शेप में होती हैं, इसलिए बाद में मैं उन्हें अपने जरूरी कागजात के साथ बांध देता हूं, ताकि मेरी बहनों की शुभकामनाएं हमेशा मेरे साथ रहें।
खून का नहीं दिल का रिश्ता
मैत्रेयी पुष्पा, साहित्यकार
मैं अपनी मां की इकलौती संतान हूं। जब मेरी उम्र डेढ वर्ष थी तभी मेरे पिताजी का स्वर्गवास हो गया था। मां ग्रामसेविका थीं। हमेशा उनका तबादला एक से दूसरे गांव में होता रहता था। उन्हें मेरी पढाई की बहुत चिंता रहती थी। वह किसी भी हाल में मुझे पढाना चाहती थीं। जब उनकी पोस्टिंग झांसी के पास खिल्ली गांव में थी, तब वहां के एक किसान परिवार से उनके बडे आत्मीय संबंध थे। वहां से जब मां का तबादला दूसरी जगह हो गया तो उन लोगों ने कहा- पुष्पा को यहीं हमारे पास रहने दो। तब मां को भी ऐसा लगा कि बार-बार जगह बदलने से मेरी पढाई का नुकसान होगा। इसलिए उन्होंने मुझे पढने के लिए उन्हीं के घर पर छोड दिया। उनके यहां कोई बेटी नहीं थी। इसलिए वहां मुझे मेरे पांच मुंहबोले भाई मिले। रक्षाबंधन वाले दिन पांचों भाई सुबह तैयार होकर मुझसे राखी बंधवाने के लिए एक कतार में बैठ जाते थे। मैंने अपने आत्मकथात्मक उपन्यास कस्तूरी कुंडल बसे में उनके बारे लिखा भी है कि युवराज और रतन सिंह जैसे भाई किसके होंगे? अब तो मेरी मां नहीं रहीं, लेकिन आज भी मेरा भरापूरा मायका कायम है। मेरी बेटियों की शादी में उन्होंने बडे उत्साह से आगे बढकर मामा के रस्मों का निर्वाह किया। मैं अकसर अपने भाइयों से कहती हूं कि खून का रिश्ता नहीं है तो क्या हुआ हमने पानी तो एक ही घर का पीया है।
सुरों का मधुर बंधन
जब भी राखी भाई-बहन के रिश्ते की बात चलती है तो सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर से जुडे कई प्रसंग याद आ जाते हैं। अभिनेता दिलीप कुमार उनके राखी भाई हैं। सन 2000 में प्रसारित टेलीविजन शो इस दुनिया के सितारे के एक एपिसोड में दिलीप कुमार को राखी बांधते हुए लता जी ने कहा था, अब तक तो सिर्फ हम ही जानते थे कि हम दोनों राखी भाई-बहन हैं, पर आज से दुनिया जानेगी। उनका यह स्नेह भरा रिश्ता आज भी बरकरार है। इसके अलावा गायक मुकेश और संगीतकार मदन मोहन को भी लता जी अपना भाई मानती थीं। मुकेश को वह हमेशा मुकेश भइया कहती थीं और उन्हें राखी बांधती थीं। यह कैसा दुखद संयोग था कि लता जी अपने इस भाई के अंतिम समय में उनके साथ थीं। अगस्त 1976 मुकेश और लता जी एक स्टेज शो में अमेरिका गए थे। वहीं दिल का दौरा पडने से उनका निधन हो गया। वहां लता जी के साथ स्टेज पर गाए गए उनके दो अंतिम गीत थे- सावन का महीना पवन करे सोर.. और कभी-कभी मेरे दिल में..। मुकेश और दिलीप कुमार की तरह लता जी के तीसरे भाई थे- संगीतकार मदन मोहन। उनके संगीत निर्देशन में लता जी ने तमाम सुरीले गीत गाए। चाहे वह फिल्म अनुपमा का गीत धीरे-धीरे मचल.. हो या अनपढ का दर्द भरा गीत आपकी नजरों ने समझा. मदन मोहन का बेहतरीन संगीत निर्देशन और लता जी की सधी हुई आवाज ने इन गीतों को अमर बना दिया। इन अच्छे गीतों के लिए वह डांट सुनने को भी तैयार रहती थीं। इस इंडस्ट्री में अगर कोई उन्हें डांट सकता था तो वह सिर्फ मदन मोहन जी ही थे। लता जी अपने इस भाई से डांट इसलिए सुनती थीं क्योंकि गीत में बोल के हिसाब से भाव नहीं आ पाते थे। जब तक मदन मोहन जीवित रहे, लता जी उन्हें राखी बांधती रहीं। यह सोचकर बडा ताज्जुब होता है कि ग्लैमर की इस दुनिया में भी पहले इतने सीधे-सच्चे रिश्ते हुआ करते थे। आज से कुछ साल पहले लता जी ने फिल्म पेज 3 के लिए एक गीत गाया था- कितने अजीब हैं रिश्ते यहां के..। इस गीत में आज के बनावटी रिश्तों की बात है और इसकी रिकॉर्डिग के दौरान उन्होंने इसके गीतकार संदीपनाथ से कहा था, तुम आज से चालीस साल पहले इंडस्ट्री में क्यों नहीं आए..?
Friday, August 5, 2011
भारत देश महान बा, जानत सब जहान बा ना..

Thursday, July 28, 2011
कामयाब हो जनपद का मान बढ़ाया !

Monday, July 25, 2011
सहज सरल व्यक्तित्व के धनी रहे पंडित परशुराम !

सोमवार को चलता पुस्तकालय सभागार में सायं बलिया हिन्दी प्रचारिणी सभा द्वारा डा.रघुवंश मणि पाठक की अध्यक्षता में आचार्य पं.परशुराम चतुर्वेदी की जयंती समारोहपूर्वक मनायी गयी। संचालन डा.शत्रुघ्न पांडेय ने किया। प्रो.रामसुन्दर राय ने वाणी वंदना प्रस्तुत की। आचार्य चतुर्वेदी के व्यक्तित्व एवं कृतीत्व पर प्रकाश डालते हुए अध्यक्ष डा.रघुवंश मणि पाठक ने कहा कि उनका व्यक्तित्व सहज था। वे सरल स्वभाव के थे। स्नेह और सौहार्द के प्रतिमूर्ति थे। इकहरा शरीर, गौरवर्ण, मध्यम कद काठी और सघन सफेद मूंछें उनके बड़प्पन को प्रकाशित करने केलिये पर्याप्त थीं। उनके मुख मंडल पर परंपरागत साहित्य की कोई विकृति की रेखा नहीं देखी गयी बल्कि एक निश्चित दीप्ति सदा थिरकती रही जिससे बंधुता एवं मैत्री भाव विकीर्ण होता रहता था। चतुर्वदी जी महान अन्नवेषक थे। मनुष्य की चिंतन परंपरा की खोज में उन्होंने संत साहित्य का गहन अध्ययन किया। वे मुक्त चिंतन के समर्थक थे इसलिये किसी सम्प्रदाय या झंडे के नीचे बंधकर रहना पसंद नहीं किया। साहित्य में विकासवादी सिद्धांत के पक्षधर थे। डा.शत्रुघ्न पांडेय ने कहा कि उनकी विद्वता के आगे बड़े-बड़ों को हमेशा झुकते देखा गया है। पं.शंभूनाथ उपाध्याय ने कहा कि उनका जीवन मानवता के कल्याण के प्रति समर्पित था। ध्रुवपति पांडेय ध्रुव ने कहा कि चतुर्वेदी जी का जीवन ही अपने आप में साहित्य है। डा.भरत पांडेय, डा.दीनानाथ ओझा, अशोक जी, डा.इन्द्रदत्त पांडेय, बृजमोहन प्रसाद अनारी, त्रिभुवन प्रसाद सिंह प्रीतम, बरमेश्वर प्रसाद वर्मा, एजाज बलियावी, सत्य स्वरूप चतुर्वेदी, रामानंद सिंह, अनंत प्रसाद रामभरोसे, शिवजी पांडेय, महावीर प्रसाद गुप्त, कैस तारविद, डा.जनार्दन चतुर्वेदी ने अपने वक्तव्य व रचनाओं से सभी को विभोर कर दिया। उक्त के अतिरिक्त सभा में श्रीकृष्ण कुमार सिंह, राधाकृष्ण उपाध्याय सहित अनेक नागरिक उपस्थित थे।
आचार्य पं.परशुराम चतुर्वेदी के 117 वें जन्मदिवस पर सांसद नीरज शेखर ने उनके हरपुर स्थित आवास परशुराम पुरी पहुंच कर उनके चित्र पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित किया। संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य जी की स्मृतियों को याद करते हुए सांसद द्वारा उनके पुत्र रिपुंजय चतुर्वेदी (पूर्व ग्राम प्रधान जवहीं), पुत्री मीरा तिवारी एवं सेवक जमुना प्रसाद को अंगवस्त्रम प्रदान कर सम्मानित किया गया। रिपुंजय चतुर्वेदी द्वारा ग्राम जवहीं को बिजली पहुंचाने और पुल के माध्यम से सड़क द्वारा जोड़ने के अनुरोध पर सकारात्मक प्रयास करने का आश्वासन दिया। इससे पहले परशुराम पुरी पहुंचने पर आचार्य जी के परिवार की ओर से सत्य स्वरूप चतुर्वेदी एवं अतुल तिवारी द्वारा माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। इस अवसर पर जनपद के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव चतुर्वेदी, संतोष राय, श्रीनिवास राय, अजय कुंवर, एचएन उपाध्याय, पूर्व चेयरमैन जवाहर प्रसाद, अजय तिवारी, समर बहादुर सिंह, रघुपति जी, बबलू तिवारी आदि उपस्थित थे।