Friday, June 25, 2010
विभिन्न कोर्स के लिए मान्यता !
सिकन्दरपुर (बलिया)। इलाहाबाद कृषि विश्वविद्यालय ने क्षेत्र के बीआईटी नवानगर को विभिन्न कोर्स के संचालन हेतु मान्यता प्रदान कर दी है। इस संस्थान को बीसीए, एमसीए, बीएससीआईटी, पीजीडीसीए,एमएससीआईटी, बीबीए, एमबीए आदि कोर्स के संचालन की मान्यता मिलने से क्षेत्र तथा जनपद के वह मेधावी छात्र जो अर्थाभाव के कारण निराश थे, इस संस्थान में प्रवेश लेकर कम खर्च में कोर्स पूरा कर सकेंगे। संस्थान के प्रबंधक भुवाल सिंह ने बताया कि हमारा अगला लक्ष्य जनरल नर्सिंग एण्ड मिडवाइफरी तथा बीटीसी प्रशिक्षण की मान्यता लेना है जिसकी पत्रावली शासन में विचाराधीन है।
Wednesday, June 23, 2010
बलिया के बलिदान पर बनेगी फिल्म बागी बलिया 1942 !
बलिया। क्रातिकारियों के बलिदान व भारत की स्वतंत्रता संग्राम में बागी बलिया की भूमिका से सम्बन्धित विजयश्री फिल्म्स प्रोडक्शन द्वारा एक फिल्म का निर्माण होगा। यह बातें स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के अध्यक्ष विनोद सिंह, अशोक चौबे व द्विजेन्द्र कुमार मिश्र ने मंगलवार को संयुक्त रूप से हुई प्रेसवार्ता के दौरान कहीं।
विनोद सिंह ने कहा कि शहीद स्मारक व स्वतंत्रता संग्राम शोध केन्द्र पुराना किला लखनऊ के तत्वावधान में बलिया की 1942 के जन आंदोलन से सम्बन्धित फिल्म बागी बलिया 1942 का निर्माण किये जाने का निर्णय लिया गया है। फिल्म के डायरेक्टर बब्बन राज होंगे। कहा कि फिल्म का निर्माण वेस्टर्न इंडिया फिल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन मुंबई द्वारा किया जाएगा। फिल्म के निर्माण में 50 से 60 लाख रुपये की लागत आने की सम्भावना है। इसका मुहुर्त जुलाई/अगस्त के मध्य कराया जाना निश्चित किया गया है। स्वतंत्रता सेनानी विश्वनाथ चौबे के पुत्र अशोक चौबे ने बताया कि फिल्म निर्माण में आने वाली लागत में सहयोग करने हेतु जनपद के सेनानी परिवारों व स्वयं सेवी संगठनों से अपील की गयी है। फिल्म की पहली शूटिंग ओक्डेनगंज चौकी से की जाएगी। फिल्म बनाने का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है। इसमें कोई भी रोमांटिक दृश्य नहीं फिल्माया जाएगा। इस फिल्म से पहले डेढ़ घंटे की एक डाक्यूमेंटरी बना ली गयी है जिसको जल्द ही सेनानियों के परिवारों व जनता को दिखायी जाएगा।
विनोद सिंह ने कहा कि शहीद स्मारक व स्वतंत्रता संग्राम शोध केन्द्र पुराना किला लखनऊ के तत्वावधान में बलिया की 1942 के जन आंदोलन से सम्बन्धित फिल्म बागी बलिया 1942 का निर्माण किये जाने का निर्णय लिया गया है। फिल्म के डायरेक्टर बब्बन राज होंगे। कहा कि फिल्म का निर्माण वेस्टर्न इंडिया फिल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन मुंबई द्वारा किया जाएगा। फिल्म के निर्माण में 50 से 60 लाख रुपये की लागत आने की सम्भावना है। इसका मुहुर्त जुलाई/अगस्त के मध्य कराया जाना निश्चित किया गया है। स्वतंत्रता सेनानी विश्वनाथ चौबे के पुत्र अशोक चौबे ने बताया कि फिल्म निर्माण में आने वाली लागत में सहयोग करने हेतु जनपद के सेनानी परिवारों व स्वयं सेवी संगठनों से अपील की गयी है। फिल्म की पहली शूटिंग ओक्डेनगंज चौकी से की जाएगी। फिल्म बनाने का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है। इसमें कोई भी रोमांटिक दृश्य नहीं फिल्माया जाएगा। इस फिल्म से पहले डेढ़ घंटे की एक डाक्यूमेंटरी बना ली गयी है जिसको जल्द ही सेनानियों के परिवारों व जनता को दिखायी जाएगा।
Tuesday, June 22, 2010
अब सामाजिक विज्ञान अंग्रेजी में पढ़ेंगे यूपी बोर्ड के छात्र !
बलिया । उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की घोषणा से शिक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ा बदलाव आने की सम्भावना प्रबल हो गयी है। कयास लगाये जा रहे हैं कि इससे सीबीएसई और यूपी बोर्ड के बच्चों के बीच सुपीरियार्टी और इन्फीरियार्टी की खाई पाटने में मदद मिलेगी और यूपी बोर्ड के बच्चों की अंग्रेजी भी प्रवीण होगी।
बता दें कि उत्तर प्रदेश एजूकेशन बोर्ड ने यह निर्णय लिया है कि वर्तमान सत्र से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाएगी और इसके लिए स्कूलों को मान्यता देने का कार्य जिले स्तर के अधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक को सौंपा गया है। हालांकि अभी शासन का यह फरमान जिले तक पहुंच नहीं पाया है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि नये फरमान का मापदण्ड और आधार क्या होगा। जनपद के बहुतेरे विद्यालयों के संचालक अंग्रेजी माध्यम से मान्यता लेने के लिए शासन की चिट्ठी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
राय बुद्धिजीविओं की : किसी ने सराहा तो किसी ने कहा कि थमेगा हिन्दी का विकास
बलिया: यूपी बोर्ड के विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की पहल को लेकर शिक्षाविदों और बुद्धिजीविओं में अलग-अलग तर्क है। कुछ इसे उचित मानते हैं तो कुछ गलत। सभी का इस विषय पर अलग-अलग तर्क है। रघुनाथ ओझा पूर्व प्राचार्य भाटपार रानी डिग्री कालेज देवरिया का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा से ग्रामीण इलाकों के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा इससे उनकी अंग्रेजी मजबूत होगी।
प्रदीप तिवारी अध्यापक लक्ष्मी राज देवी इण्टर कालेज बलिया भी इसे शिक्षा विभाग की अच्छी पहल बताते हैं। डा. आशुतोष शुक्ल बताते हैं कि शासन ने यह जो फैसला किया है वह सराहनीय है और इससे यूपी बोर्ड के लड़कों को आज के दौड़ में बराबर दौड़ने का अवसर मिलेगा। कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो जाने के कारण केन्द्र सरकार की पहल पर अच्छे अध्यापक भी नियुक्त किये जाएंगे। डा.अखिलेश राय ने कहा कि यूपी बोर्ड के इस फैसले से हिन्दी का भारी नुकसान होगा। बच्चों के ऊपर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। श्री राय बताते हैं कि आज जो विद्यालय अपने आप को अंग्रेजी का जनक बताने का दावा करते हैं उनके यहां तो अंग्रेजी का स्तर काफी सतही है तो यूपी बोर्ड की क्या बिसात। कहा कि सिर्फ मान्यता दे देने से विद्यालय का माहौल नहीं बदल सकता इसके लिए काफी तैयारी की आवश्यकता है। यूपी बोर्ड के जिन अध्यापकों को अच्छी हिन्दी नहीं आती उनसे क्या अपेक्षा की जाय कि वे अंग्रेजी पढ़ा सकते हैं।
अभी प्राप्त नहीं हुआ आदेश: शिवजी
बलिया: सीबीएसई की तर्ज पर यूपी बोर्ड के स्कूलों में मान्यता और शिक्षा देने के सवाल पर जिविनि की अनुपस्थिति में कार्यालय के मान्यता लिपिक शिवजी उपाध्याय ने कहा कि अभी शासन से इस बाबत कोई आदेश या पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। अत: इस बाबत कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। विद्यालयों द्वारा अप्रोच किये जाने पर कहा कि एकाध लोग इस बाबत इन्क्वायरी किये हैं पर उन्हे शासनिक पत्र आने तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया है।
बता दें कि उत्तर प्रदेश एजूकेशन बोर्ड ने यह निर्णय लिया है कि वर्तमान सत्र से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाएगी और इसके लिए स्कूलों को मान्यता देने का कार्य जिले स्तर के अधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक को सौंपा गया है। हालांकि अभी शासन का यह फरमान जिले तक पहुंच नहीं पाया है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि नये फरमान का मापदण्ड और आधार क्या होगा। जनपद के बहुतेरे विद्यालयों के संचालक अंग्रेजी माध्यम से मान्यता लेने के लिए शासन की चिट्ठी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
राय बुद्धिजीविओं की : किसी ने सराहा तो किसी ने कहा कि थमेगा हिन्दी का विकास
बलिया: यूपी बोर्ड के विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने की पहल को लेकर शिक्षाविदों और बुद्धिजीविओं में अलग-अलग तर्क है। कुछ इसे उचित मानते हैं तो कुछ गलत। सभी का इस विषय पर अलग-अलग तर्क है। रघुनाथ ओझा पूर्व प्राचार्य भाटपार रानी डिग्री कालेज देवरिया का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा से ग्रामीण इलाकों के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा इससे उनकी अंग्रेजी मजबूत होगी।
प्रदीप तिवारी अध्यापक लक्ष्मी राज देवी इण्टर कालेज बलिया भी इसे शिक्षा विभाग की अच्छी पहल बताते हैं। डा. आशुतोष शुक्ल बताते हैं कि शासन ने यह जो फैसला किया है वह सराहनीय है और इससे यूपी बोर्ड के लड़कों को आज के दौड़ में बराबर दौड़ने का अवसर मिलेगा। कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू हो जाने के कारण केन्द्र सरकार की पहल पर अच्छे अध्यापक भी नियुक्त किये जाएंगे। डा.अखिलेश राय ने कहा कि यूपी बोर्ड के इस फैसले से हिन्दी का भारी नुकसान होगा। बच्चों के ऊपर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। श्री राय बताते हैं कि आज जो विद्यालय अपने आप को अंग्रेजी का जनक बताने का दावा करते हैं उनके यहां तो अंग्रेजी का स्तर काफी सतही है तो यूपी बोर्ड की क्या बिसात। कहा कि सिर्फ मान्यता दे देने से विद्यालय का माहौल नहीं बदल सकता इसके लिए काफी तैयारी की आवश्यकता है। यूपी बोर्ड के जिन अध्यापकों को अच्छी हिन्दी नहीं आती उनसे क्या अपेक्षा की जाय कि वे अंग्रेजी पढ़ा सकते हैं।
अभी प्राप्त नहीं हुआ आदेश: शिवजी
बलिया: सीबीएसई की तर्ज पर यूपी बोर्ड के स्कूलों में मान्यता और शिक्षा देने के सवाल पर जिविनि की अनुपस्थिति में कार्यालय के मान्यता लिपिक शिवजी उपाध्याय ने कहा कि अभी शासन से इस बाबत कोई आदेश या पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। अत: इस बाबत कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। विद्यालयों द्वारा अप्रोच किये जाने पर कहा कि एकाध लोग इस बाबत इन्क्वायरी किये हैं पर उन्हे शासनिक पत्र आने तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया है।
सुरहा की हसीन वादियों में घुली जहर जमीन में पड़ी दरारे !
बेरुआरबारी (बलिया), निप्र । सुरहाताल की हसीन वादियों में जहां कभी अथाह जल से पूरा सुरहाताल भरा रहता था और उसमें विभिन्न प्रकार के हजारों-हजार की संख्या में पशु पक्षियां विचरण करती थीं। सुबह-सुबह ही उनकी मनमोहक आवाजें सुनकर लोग जग जाते थे। नावों पर सवार मछुवारे अपनी जीविका के लिए सुबह ही मछली पकड़ने निकल पड़ते थे तथा सुरहाताल के किनारे-किनारे हरी हरी घास काटने व गाय भैंस चराने क्षेत्र के सैकड़ों पशुपालक लाया करते थे। इसे देख लगता मानों धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है। इस वर्ष अवर्षण व भीषण सूखे के चलते पूरा सुरहाताल सूख गया है और धरती पर बड़ी-बड़ी दरारें फट गयी हैं। काले ताल में भी काफी कम पानी हो जाने से मछुवारों के रोजी रोटी पर आफत आन पड़ी है। पशु से लेकर पक्षी तक पानी की तलाश में इधर से उधर भटक रहे हैं। अब तक दर्जनों नील गायें पानी की तलाश में काले ताल के तरफ रूख कीं तो कीचड़ में फंस कर दम तोड़ दीं। पानी के लिए हाहाकार मचा है, भगवान भास्कर भी इसमें सहयोग कर लोगों की जान आफत में डाले हुए हैं। सुरहाताल की धरती पर बड़ी-बड़ी दरारें फट गयी हैं। अब पक्षियों की आवाज सुनने के लिए कान तरस रहे हैं। ग्राम पंचायत शिवपुर की प्रधान श्रीमती ललिता देवी ने लगातार तीन चार दिनों तक गड़ारी नाले में ट्यूबवेल से पारी भरवाकर पशुओं के पीने के लिए व्यवस्था की लेकिन यह भी ऊंट के मुंह के जीरा ही साबित हुआ। धोबी घाट से लेकर हर जगह सूखा ही सूखा है। सुरहाताल में इस महीने धान की रोपाई का कार्य लगभग पूरा हो जाया करता था। और चारों तरफ लहलहाते धान की खेती दिखती थी। आज सूखे की मार से सुरहाताल की हसीन-वादियां चारों तरफ वीरान नजर आ रही हैं।
Monday, June 21, 2010
मिले संसाधन तो अव्वल होगा बलिया का किसान !
बेरुआरबारी (बलिया)। विद्युत व्यवस्था व सिंचाई के साधन अगर समुचित हो जायं तो अन्य राज्यों से भी अधिक उत्पादन यहां के किसान कर सकते हैं लेकिन व्यवस्था नहीं होने से खेती करने में काफी कठिनाइयां उठानी पड़ रही हैं। उक्त बातें स्थानीय विकास खण्ड के टण्ड़वा निवासी किसान रवीन्द्र नाथ चौबे ने कहीं। लगभग एक एकड़ में श्री चौबे ने मूंग की खेती बेड प्लाटिंग के तहत कर अब तक दो बार तोड़ाई कर चूके हैं। श्री चौबे ने बताया कि इस विधि से खेती करने पर किसानों का खाद, पानी व बीज काफी कम लगता है तथा पैदावार काफी अच्छी होती है। उन्होंने बताया कि अब तक देश व प्रदेश के दर्जनों स्थानों पर जाकर किसानों द्वारा की जा रही नई विधि से खेती का हमने अवलोकन किया। हमारे प्रदेश के किसानों को खेती करने में जो दिक्कतें सामने आ रही है उनमें सबसे ज्यादा विद्युत व पानी की जर्जर व्यवस्था है। दिल्ली, पूसा, हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में अधिक पैदावार का मुख्य कारण किसानों का सुविधाओं से लैस होना है। बाहर के किसान जहां संसाधनों से पूर्ण हैं वहीं उनकी विद्युत व्यवस्था भी पूरी तरह चुस्त है। अगर वही व्यवस्था हमारे राज्य में हो जाय तो हम भी पैदावार के मामले में अन्य राज्यों की अपेक्षा देश में पहला स्थान प्राप्त करे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के सौजन्य से जनपद में प्राकृतिक संसाधन संरक्षण तकनीकी कार्यक्रम के तहत जीरोटिल, बेड प्लाटिंग तथा ट्रैफिक कन्ट्रोल तकनीकी से की जा रही खेती से किसान काफी लाभान्वित हो रहे हैं। बेड प्लाटिंग के तहत मूंग की खेती के बारे में श्री चौबे ने बताया कि इसके दो लाभ हैं एक तो काफी अच्छी पैदावार व दूसरा मूंग पत्ते आदि को हैरो कराकर हरी खाद के रूप में प्रयोग होना तथा इसी में धान की खेती करने से काफी कम लागत में धान की पैदावार भी अच्छी होगी। श्री चौबे ने किसानों को नई तकनीक से खेती कर लाभ उठाने की भी बात कही। अब क्षेत्र के आसपास के गांवों के किसान श्री चौबे के यहां जाकर खेती करने के तरीके सीख रहे हैं तथा इस नई विधि को अपना कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में लगे हैं।
माननीयों के कृपा पाला नहीं तो गये काम से !
बलिया । यदि आप पिछड़ी जाति के गरीब व मजबूर व्यक्ति हैं तो आपकी पुत्रियों की शादी में सरकार द्वारा दस हजार रुपये देने का प्राविधान है।
ज्ञात हो कि सरकार प्रति वर्ष पिछड़ी जाति के गरीब व कमजोर लोगों की बेटियों के विवाह में दस हजार की धनराशि प्रदान करती है। इसे पाने के लिए संबंधित जन को कितने पापड़ बेलने पड़ते है कहना मुश्किल है। विभाग के तमाम पैतरों को पार करने के बाद भी उसकी पात्रता का पैमाना वहीं आकर अटक जाता है कि वह अपने इलाके के माननीय का कृपा पात्र है या नहीं। यदि नहीं तो सारी पात्रता कूड़े में चली जाती है। पिछड़ी जाति शादी अनुदान योजना की पात्रता की चर्चा करें तो ग्रामीण क्षेत्र में वार्षिक आय 19884 रुपये तथा शहरी क्षेत्र में 25446 रुपये तक के लोग इसकी पात्रता में आते हैं। पर शासन द्वारा पैसा सीमित मात्रा में उपलब्ध कराये जाने के नाते सभी को यह लाभ नहीं मिल पाता। लाभ वही पाते हैं जिनका जुगाड़ अपने विधायक अथवा सांसद तक होता है। अगर नहीं तो गये काम से। हालांकि अनुदान योजना में निराश्रितों, विधवा, विकलांग तथा भूमिहीनों को वरीयता दिये जाने का प्राविधान है पर धरातल पर ऐसा होता नहीं है। अपात्रों को इसका भरपूर लाभ मिल रहा है।
पिछड़ी जाति शादी अनुदान के बाबत जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी डीडी सिंह का कहना है कि शासन द्वारा प्रति पात्र व्यक्ति दस हजार रुपये दिये जाने का प्राविधान तो है पर उतनी धनराशि प्राप्त नहीं हो पाती कि जनपद के सभी आवेदकों को संतृप्त किया जा सके। वर्तमान सत्र के बारे में कहा कि इस वर्ष अब तक 41 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं। वितरण के बाबत उनका मत है कि प्रयास होता है कि पहले निराश्रितों विधवा, विकलांग तथा भूमिहीनों को ही लाभ दिया जाए। कहा कि पात्रों को तय करने के लिए 'माननीयों' की कमेटी का गठन किया जाता है।
ज्ञात हो कि सरकार प्रति वर्ष पिछड़ी जाति के गरीब व कमजोर लोगों की बेटियों के विवाह में दस हजार की धनराशि प्रदान करती है। इसे पाने के लिए संबंधित जन को कितने पापड़ बेलने पड़ते है कहना मुश्किल है। विभाग के तमाम पैतरों को पार करने के बाद भी उसकी पात्रता का पैमाना वहीं आकर अटक जाता है कि वह अपने इलाके के माननीय का कृपा पात्र है या नहीं। यदि नहीं तो सारी पात्रता कूड़े में चली जाती है। पिछड़ी जाति शादी अनुदान योजना की पात्रता की चर्चा करें तो ग्रामीण क्षेत्र में वार्षिक आय 19884 रुपये तथा शहरी क्षेत्र में 25446 रुपये तक के लोग इसकी पात्रता में आते हैं। पर शासन द्वारा पैसा सीमित मात्रा में उपलब्ध कराये जाने के नाते सभी को यह लाभ नहीं मिल पाता। लाभ वही पाते हैं जिनका जुगाड़ अपने विधायक अथवा सांसद तक होता है। अगर नहीं तो गये काम से। हालांकि अनुदान योजना में निराश्रितों, विधवा, विकलांग तथा भूमिहीनों को वरीयता दिये जाने का प्राविधान है पर धरातल पर ऐसा होता नहीं है। अपात्रों को इसका भरपूर लाभ मिल रहा है।
पिछड़ी जाति शादी अनुदान के बाबत जिला पिछड़ा वर्ग कल्याण अधिकारी डीडी सिंह का कहना है कि शासन द्वारा प्रति पात्र व्यक्ति दस हजार रुपये दिये जाने का प्राविधान तो है पर उतनी धनराशि प्राप्त नहीं हो पाती कि जनपद के सभी आवेदकों को संतृप्त किया जा सके। वर्तमान सत्र के बारे में कहा कि इस वर्ष अब तक 41 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं। वितरण के बाबत उनका मत है कि प्रयास होता है कि पहले निराश्रितों विधवा, विकलांग तथा भूमिहीनों को ही लाभ दिया जाए। कहा कि पात्रों को तय करने के लिए 'माननीयों' की कमेटी का गठन किया जाता है।
Thursday, June 17, 2010
गांवों में ढूंढे नहीं मिल रही हीरा-मोती की जोड़ी !
रतसर (बलिया), निप्र । क्षेत्र में गांवों की जिन्दगी से दो बैलों की जोड़ी की परम्परा व रस्म रिवाज तेजी से समाप्त हो रही है। यदि यही स्थिति लगातार बनी रही तो इसमें दो राय नहीं कि आने वाले दिनों में ये परम्पराएं मात्र यादगार बनकर रह जायेंगी। जब से गांवों में टै्रक्टर, बिजली व अन्य वैज्ञानिक कृषि संयन्त्रों का तेजी से प्रचलन बढ़ा है सदियों से चली आ रही दो बैलों की जोड़ी की उपयोगिता यहां से समाप्त होती जा रही है। अब तो ढूंढने पर भी नहीं मिल रही है हीरा-मोती की जोड़ी।
कस्बे के बड़े बुजुर्गो का कहना है कि कभी ऐसा भी समय था जब गांवों में लोगों के दरवाजे पर पक्की व कच्ची मिट्टी की चरन बनायी जाती थी। एक तरफ बैलों की जोड़ियां तो दूसरी तरफ दुधारू बांधे जाते थे। पहले जब ग्राम्यांचलों में कृषि संयंत्रों का प्रचलन नहीं था उस समय इन्हीं बैलों के सहारे खेती बारी घर गृहस्थी से लेकर सिंचाई मड़ाई यहां तक की तेल की पेराई तक की जाती थी। आज के परिवेश में सब कुछ बदल चुका है सारा काम आधुनिक यंत्रों की सहायता से कराया जा रहा है। यहीं नहीं गांव की पक्की सड़क पर जब से टै्रक्टर व ट्रालियों ने तेज गति से सफर करना शुरू कर दिया है मंद गति से चलने वाली बैलगाड़ियों का युग धीरे-धीरे समाप्ति पर है।
एक समय था जब इन बैलगाड़ियों का समान ढोने से लेकर नव विवाहित दुल्हनों की विदाई तक में प्रयोग होता था। सूर्य की निकली किरणों की आकृति वाले पहियों व काष्ठ उपकरणों पर आधारित बैलगाड़ियों को घुघरूओं व घंटियों से बंधे जुड़वा बैलों द्वारा खींचा जाता था। गांव की कच्ची उबड़-खाबड़ रास्तों पर बैलगाडि़यों को खींचते हुए जब जुड़वा बैल घुघरूओं को खनकाते व गले की घंटियों को बजाते हुए आगे बढ़ते थे बरबस ही लोगों की आंखे इनकी ओर आकर्षित हो जाती थीं। वर्तमान में शहरों के रूप में बदलते गांवों की तस्वीर में जुड़वा बैलों व बैलगाड़ियों की आकृतियां धुंधली पड़ती जा रही हैं। कस्बे सहित आसपास के गांवों में स्थिति यह है कि मात्र गिनती के ही किसानों के पास बैल हैं। वो भी शौक के तौर पर रखे गये हैं। वैसे पुराने किसानों का मानना है कि दुनिया में उन्हीं देशों की अर्थ व्यवस्था टिकाऊ सिद्ध हुई है जो मानव व पशु श्रम पर आधारित रही है। इस अर्थ में यंत्रीकरण का मानव व पशु श्रम के रूप में स्थापित होना शुभ संकेत नहीं है।
कस्बे के बड़े बुजुर्गो का कहना है कि कभी ऐसा भी समय था जब गांवों में लोगों के दरवाजे पर पक्की व कच्ची मिट्टी की चरन बनायी जाती थी। एक तरफ बैलों की जोड़ियां तो दूसरी तरफ दुधारू बांधे जाते थे। पहले जब ग्राम्यांचलों में कृषि संयंत्रों का प्रचलन नहीं था उस समय इन्हीं बैलों के सहारे खेती बारी घर गृहस्थी से लेकर सिंचाई मड़ाई यहां तक की तेल की पेराई तक की जाती थी। आज के परिवेश में सब कुछ बदल चुका है सारा काम आधुनिक यंत्रों की सहायता से कराया जा रहा है। यहीं नहीं गांव की पक्की सड़क पर जब से टै्रक्टर व ट्रालियों ने तेज गति से सफर करना शुरू कर दिया है मंद गति से चलने वाली बैलगाड़ियों का युग धीरे-धीरे समाप्ति पर है।
एक समय था जब इन बैलगाड़ियों का समान ढोने से लेकर नव विवाहित दुल्हनों की विदाई तक में प्रयोग होता था। सूर्य की निकली किरणों की आकृति वाले पहियों व काष्ठ उपकरणों पर आधारित बैलगाड़ियों को घुघरूओं व घंटियों से बंधे जुड़वा बैलों द्वारा खींचा जाता था। गांव की कच्ची उबड़-खाबड़ रास्तों पर बैलगाडि़यों को खींचते हुए जब जुड़वा बैल घुघरूओं को खनकाते व गले की घंटियों को बजाते हुए आगे बढ़ते थे बरबस ही लोगों की आंखे इनकी ओर आकर्षित हो जाती थीं। वर्तमान में शहरों के रूप में बदलते गांवों की तस्वीर में जुड़वा बैलों व बैलगाड़ियों की आकृतियां धुंधली पड़ती जा रही हैं। कस्बे सहित आसपास के गांवों में स्थिति यह है कि मात्र गिनती के ही किसानों के पास बैल हैं। वो भी शौक के तौर पर रखे गये हैं। वैसे पुराने किसानों का मानना है कि दुनिया में उन्हीं देशों की अर्थ व्यवस्था टिकाऊ सिद्ध हुई है जो मानव व पशु श्रम पर आधारित रही है। इस अर्थ में यंत्रीकरण का मानव व पशु श्रम के रूप में स्थापित होना शुभ संकेत नहीं है।
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